शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 453 of 526
Read in contextचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् । ३६७
विगृह्य याति हि यदा सर्वाञ्छत्रुगणान् बलात् ॥ २५४ ॥
विगृह्य यानं यानज्ञैस्तदाचार्यैः प्रचक्ष्यते ।
**विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण—**जब कोई राजा किसी प्रकार का विग्रह का कारण दिखाकर जबरदस्ती शत्रुगणों पर चढ़ाई कर देता है तो उसे यान के जानने वाले राजनीति के आचार्य गण ‘विगृह्ययान’ कहते हैं।
अरिमित्राणि सर्वाणि स्वमित्रैः सर्वतो बलात् ॥ २५५ ॥
विगृह्य चारिभिर्गन्तुं विगृह्य गमनं तु वा ।
अथवा किसी २ के मत से शत्रु के साथ बलपूर्वक चारो तरह से लड़वा-कर जो शत्रु पर चढ़ाई करना है वह ‘विगृह्ययान’ कहलाता है।
सन्धायान्यत्र यात्रायां पाष्णिग्राहेण शत्रुना ॥ २५६ ॥
सन्धाय गमनं प्रोक्तं तज्जिगीषोः फलार्थिनः ।
**सन्धायान के लक्षण—**विजय को चाहनेवाले राजा को विशेष फल की इच्छा रखनेवाले विद्वान-अन्यत्र किसी शत्रु पर चढ़ाई करने के समय उसके पूर्व अपने पृष्ठ भाग-स्थित पड़ोसी शत्रु राजा के साथ सन्धि करके चढ़ाई करने को 'सन्धायागमन (यान)' कहते हैं।
एको भूपो यदैकत्र सामन्तैः सांपरायिकैः ॥ २५७ ॥
शक्तिशौर्ययुतैर्यानं सम्भूय गमनं हि तत् ।
**संभूययान के लक्षण—**अकेला कोई राजा यदि शक्ति तथा शूरता से युक्त और युद्ध करने में कुशल सामन्तों के साथ एकत्र होकर किसी पर चढ़ाई करे तो 'संभूयगमन (यान)' कहते हैं।
अन्यत्र प्रस्थितः सङ्गादन्यत्रैव च गच्छति ॥ २५८ ॥
प्रसङ्गयानं तत् प्रोक्तं यानविद्भिश्च मन्त्रिभिः ।
**प्रसङ्गयानं के लक्षण—**अन्यत्र किसी पर चढ़ाई करने के लिये चल चुकने पर मार्ग में यदि प्रसङ्गवश उससे अन्यत्र चढ़ाई करने के लिये चल देवें तो उसे यानवेत्ता मन्त्रिगण 'प्रसङ्गयान' कहते हैं।
रिपुं यातस्य बलिनः सम्प्राप्य विकृतं फलम् ॥ २५९ ॥
उपेक्ष्य तस्मिन् तद्यानमुपेक्षायानमुच्यते ।
**उपेक्षायान के लक्षण—**जो शत्रु बुरे फल को पाकर स्वयं विपन्न अवस्था में पड़ गया हो उसकी यदि उपेक्षा करके उसके ऊपर चढ़ाई कर दी जाय तो उसे 'उपेक्षायान' कहते हैं।
दुर्वृत्तेऽप्यकुलीने तु बलं दातरि रज्यते ॥ २६० ॥
हृष्टं कृत्वा स्वयम्बलं पारितोष्यप्रदानतः ।
नायकः पुरतो यायात् प्रवीरपुरुषावृतः ॥ २६१ ॥