शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११
साक्षी के भेदन को प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश—
जहाँ पर प्रथम, मध्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के सभी साक्षी दूसरों के द्वारा फोड़ लिये गये हों वहाँ पर दिव्य शपथ के द्वारा अभियोग का निर्णय करना चाहिये।
स्थावरेषु विवादेषु पूगश्रेणिगणेषु च।
दत्तादत्तेषु भृत्यानां स्वामिनां निर्णये सति ॥ २५६ ॥
विक्रयादानसम्बन्धे क्रीत्वा धनमनिच्छति।
साक्षिभिर्लिखितेनाथ भुक्त्या चैतान् प्रसाधयेत् ॥ २६० ॥
स्थावर (अचल) संपत्ति-विषयक विवाद और पूग (जाति-विशेष का सङ्घ), श्रेणि (विभिन्न जातियों का सङ्घ) और गण (एक ही प्रकार की जाति का सङ्घ)—विषयक विवाद एवं भृत्यों को वेतन (तनखाह) दिया गया या नहीं तथा किसी वस्तु का स्वामी कौन है इसके निर्णय में (अथवा दी हुई वस्तु के दिये जाने पर किंवा भृत्य और स्वामी परस्पर किसी किये हुये निर्णयविषयक विवाद में) एवं बेची हुई वस्तु के न देने के सम्बन्ध में, खरीदने के बाद पुनः उसे न लेने की इच्छा करने पर साक्षी, लेखपत्र एवं कब्जा के आधार पर इन सबों का निर्णय करे।
विवाहोत्सवद्यूतेषु विवादे समुपस्थिते।
साक्षिणः साधनं तत्र न दिव्यं न च लेख्यकम् ॥ २६१ ॥
**विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश—**विवाह, उत्सव तथा द्यूत (जुआ) विषयक विवाद उपस्थित होने पर साक्षी ही मुख्य प्रमाण माना जाता है। वहां पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है एवं लिखित भी प्रमाण नहीं माँगा जाता है।
द्वारमार्गक्रियाभोग्यजलवाहादिषु तथा।
भुक्तिरेव तु गुर्वी स्यान्न दिव्यं न च साक्षिणः ॥ २६२ ॥
**द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोग को ही प्रमाण मानने का निर्देश—**द्वार और मार्ग का बनाना, भोग में आने वाली वस्तु एवं जल के प्रवाह आदि के अभियोग में (भुक्ति = कब्जा) ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना जाता है वहाँ पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है और साक्षी को भी प्रमाण नहीं माना जाता है।
यद्येके मानुषीं ब्रूयादन्यो ब्रूयात्तु दैविकीम्।
मानुषीं तत्र गृह्णीयान्न तु दैवीं क्रियां नृपः ॥ २६३ ॥
**मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश—**यदि वादी-प्रतिवादी में एक मानुषी क्रिया (प्रमाण) के विषय में कहे और दूसरा