शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| ३१२ | शुक्रनीतिः |
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दैविकी क्रिया (दिव्य शपथ) के विषय में कहे तो वहाँ पर राजा मानुषी क्रिया को ग्रहण करे किन्तु दैवी क्रिया को कदापि नहीं ग्रहण करे।
यद्येकदेशप्राप्ताऽपि क्रिया विद्येत मानुषी ।
सा ग्राह्या न तु पूर्णापि दैविकी वदतां नृणाम् ॥ २६४ ॥
भले ही मानुषी क्रिया अभियोग के एक ही अंश की पुष्टि करती हो किन्तु उसी को ही ग्रहण करे। पूर्ण अंश की पुष्टि करने वाली दैवी क्रिया के कहने वालों की बात को न माने।
प्रमाणैर्हेतुचरितैः शपथेन नृपाज्ञया ।
वादिसंप्रतिपत्त्या वा निर्णयः षड्विधः स्मृतः ॥ २६५ ॥
६ प्रकार के निर्णय का निर्देश— १ प्रमाण (साक्षी, लेख आदि), २ हेतु, ३ आचरण, ४ शपथ, ५ राजा की आज्ञा, ६ वादी की सम्मति इन ६ प्रकारों के द्वारा सम्पन्न किये जाने से निर्णय ६ प्रकार का होता है।
लेख्यं यत्र न विद्येत न भुक्तिर्न च साक्षिणः ।
न च दिव्यावतारोऽस्ति प्रमाणं तत्र पार्थिवः ॥ २६६ ॥
सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश— जहाँ पर लेख, भुक्ति (कब्जा), साक्षी एवं दिव्य शपथ का भी अवसर इनमें से कोई भी प्रमाण न उपस्थित किया गया हो वहाँ पर राजा ही का निर्णय प्रमाण माना जाता है।
निश्चेतुं ये न शक्याः स्युर्वादाः संदिग्धरूपिणः ।
सीमाद्यास्तत्र नृपतिः प्रमाणं स्यात् प्रभुर्यतः ॥ २६७ ॥
जो सीमा आदि के विवाद सन्दिग्ध रूप होने से निश्चय रूप से निर्णय नहीं किये जा सकते हैं वहाँ पर राजा ही प्रमाण होता है क्योंकि वह प्रभु है।
स्वतन्त्रः साधयन्नर्थान् राजाऽपि स्याच्च किल्बिषी ।
धर्मशास्त्राऽविरोधेन ह्यर्थशास्त्रं विचारयेत् ॥ २६८ ॥
धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश— स्वतन्त्र रूप से (बिना प्रमाण के) विवादों का निर्णय करता हुआ राजा पापी होता है अतः धर्मशास्त्र के विरोध से बचता हुआ राजा अर्थशास्त्र का विचार करे अर्थात् धर्मशास्त्रानुसार निर्णय करे।
राजामात्यप्रलोभेन व्यवहारस्तु दुष्यति ।
लोकोऽपि च्यवते धर्मात्कूटार्थे संप्रवर्तते ॥ २६९ ॥
विवाद होने के कारणों का निर्देश— राजा तथा अमात्य (मन्त्री) के लोभाधिक्य से व्यवहार (मुकदमा) का निर्णय दोषयुक्त होता है। और