Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 396 of 526

Read in context
Page 396

३१० | शुक्रनीतिः

वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश—
जहां पर प्राण का संकट उपस्थित हो ऐसे विवाद में भले ही साधन (प्रमाण) विद्यमान हो किन्तु अभियुक्त दिव्य शपथ का आश्रय ले सकता है वहां पर वादी साधन के विषय में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं कर सकता है।

सोपधं साधनं यत्र तद्राज्ञे श्रावितं यदि ।
शोधयेत्तत्तु .दिव्येन राजा धर्मासनस्थितः ॥ २५३ ॥

यदि किसी विवाद में (प्रमाण) जाली हो और उसकी सूचना राजा को मिल जावे तो धर्मासन पर बैठा हुआ राजा दिव्य शपथ द्वारा उसकी परीक्षा करे।

यन्नामगोत्रैर्यल्लेख्यतुल्यं लेख्यं यदा भवेत् ।
अगृहीतधने तत्र कार्यो दिव्येन निर्णयः ॥ २५४ ॥

भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश— रुपया न लेने पर भी यदि उसके नाम-गोत्र के साथ ऋणपत्र का सचमुच कोई जाली लेख तैयार करके रूपये की नालिश कर दे तो वहां पर राजा सत्यासत्य का निर्णय दिव्य शपथ द्वारा करे।

मानुषं साधनं न स्यात्तत्र दिव्यं प्रदापयेत् ।
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश— जहाँ पर कोई लौकिक प्रमाण न मिले वहां पर दिव्य शपथ दिलाना चाहिये।

अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे ॥ २५५ ॥
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु सर्वार्थापह्नवेषु च ।
प्रदुष्टेषु प्रमाणेषु दिव्यैः कार्यं विशोधनम् ॥ २५६ ॥

जङ्गल, निर्जन स्थान, रात्रि, घर के भीतरी भाग, डाँका पड़ना आदि साहस कर्म, और स्त्रियों के आचरण इन सबों के विषय से सम्बद्ध अभियोग में और जहां पर सम्पूर्ण अर्थ का रहस्य न ज्ञात होता हो एवं प्रमाण दूषित होने से माननीय न होने पर दिव्य शपथ द्वारा अपराधी की परीक्षा करनी चाहिये।

महापापामिशापेषु निक्षेपहरणेपु च ।
दिव्यैः कार्यं परीक्षेत राजा सत्स्वपि साक्षिषु ॥ २५७ ॥

यद्यपि साक्षी भले ही हों तो भी राजा बड़े २ अपराधों एवं धरोहर के हड़प कर जाने इत्यादि अभियोगों में दिव्य शपथ द्वारा परीक्षा लेकर ही निर्णय करे।

प्रथमा यत्र भिद्यन्ते साक्षिणश्च तथा परे ।
परेभ्यश्च तथा चान्ये तं वादं शपथैर्नयेत् ॥ २५८ ॥