शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context२९६ | शुक्रनीतिः
यदि वादी अन्यथा अर्थात् शास्त्र (कानून) के विरुद्ध किसी साधन में व्यर्थ दोष दिखाता है तो वह दण्डनीय होता है और वह जिसे सिद्ध करना चाहता है उससे च्युतं हो जाता है (उसका मुकद्दमा खारिज कर दिया जाता है)। अतः राजा साधनों (प्रमाणों) पर पूर्ण विचार कर विवाद का निर्णय करे।
कूटसाधनकारी तु दण्ड्यः कार्यानुरूपतः ॥ १६८ ॥
द्विगुणं कूटसाक्षी तु साक्ष्यलोपी तथैव च ।
कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश— झूठा प्रमाण उपस्थित करने वाला (वादी या प्रतिवादी) कार्य (मुकदमा) के अनुसार थोड़ा या अधिक दण्ड (जुर्माना) का अधिकारी होता है। झूठी गवाही देने वाला या गवाह की सही बात को न मानने वाला पुरुष द्विगुण दण्ड का भागी होता है।
अधुना लिखितं वच्मि यथावदनुपूर्वशः ॥ १६९ ॥
अनुभूतस्मारकं तु लिखितं ब्रह्मणा कृतम् ।
इस समय मैं आनुपूर्वी क्रम से यथावत् लिखित साधन के विषय में कहता हूँ। ब्रह्मा ने अनुभूत विषय को स्मरण कराने के लिये 'लिखित' का निर्माण किया है।
राजकीयं लौकिकं च द्विविधं लिखितं स्मृतम् ॥ १७० ॥
स्वहस्तलिखितं वाऽन्यहस्तेनापि विलेखितम् ।
असाक्षिमत् साक्षिमच्च सिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः ॥ १७१ ॥
लिखित के दो प्रकारों के निर्देश— राजकीय और लौकिक भेद से लिखित दो प्रकार का होता है। और इनमें से प्रत्येक लिखित पुनः अपने हाथ से और दूसरे के हाथ से लिखा होने से दो प्रकार का होता है। और सभी प्रकार के लेख साक्षी से युक्त या बिना साक्षी के भी होते हैं। उनकी सिद्धि देश की स्थिति के अनुसार होती है।
भाग-दान-क्रयाऽऽधान-संविद्-दास-ऋणादिभिः ।
सप्तधा लौकिकं चैतत्—
लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश— १. भाग (बटवारा), २. दान, ३. क्रय, ४. आधान (धरोहर), ५. संवित् (इकरार), ६. दास, ७. ऋण आदि भेद से लौकिक लिखित ७ प्रकार का होता है।
—त्रिविधं राजशासनम् ॥ १७२ ॥
शासनार्थं ज्ञापनार्थं निर्णयार्थं तृतीयकम् ।
राजशासन के ३ प्रकार— और राजकीय लिखित तीन प्रकार का है