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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 381 of 526

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Page 381

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् । २९५

दैवं घटादि तद्भव्यं भूतालाभाभियोजयेत् ।
उसमें लिखित, भोगयुक्त (कब्जे में रहना), और साक्षी, ये तीन प्रकार के मानुष प्रमाण होते हैं । तुला-दण्डादि रूप प्रमाण को 'दैव' कहते हैं । इसी को 'भव्य' भी कहते हैं । इसका प्रयोग यथार्थ का निश्चय न होने पर किया जाता है ।

तत्त्वच्छलानुसारित्वाद् भूतं भव्यं द्विधा स्मृतम् ॥ १६२ ॥
तत्त्वं सत्यार्थाभिधायि कूटायमभिहितं छलम् ।

तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण— तत्त्व तथा छल के अनुसार से साधन-क्रम से भूत तथा भव्य रूप से २ प्रकार का कहा गया है । उसमें सत्य अर्थ का प्रतिपादक साधन 'तत्त्व' कपट आदि से युक्त साधन 'छल' कहा जाता है ।

छलं निरस्यं भूतेन व्यवहारान् नयेन्नृपः ॥ १६३ ॥
युक्त्याऽनुमानतो नित्यं सामादिभिरुपक्रमैः ।

राजा युक्ति, अनुमान तथा सामादि उपायों से छल को दूर कर यथार्थ साधनों से व्यवहारों (मुकदमों) को सदा देखे ।

न कालहरणं कार्यं राज्ञा साधनदर्शने ॥ १६४ ॥
महान् दोषो भवेत् कालाद्धर्मव्यापत्तिलक्षणः ।

राजा वादी-प्रतिवादियों के साधनों (प्रमाणों) को देखने में समय न बितावे बल्कि तत्काल ही देखे । अन्यथा विलम्ब करने से धर्मनाश रूपी महान दोष उपस्थित हो जाता है ।

अर्थिप्रत्यर्थिप्रत्यक्षं साधनानि प्रदर्शयेत् ॥ १६५ ॥
अप्रत्यक्षं तयोर्नैव गृह्णीयात् साधनं नृपः ।

विवादी को अपने २ साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश— राजा अर्थी-प्रत्यर्थी (वादी-प्रतिवादी) दोनों के सामने साधनों को दिखाये और दोनों के परोक्ष में साधन न देखे ।

साधनानां च ये दोषा वक्तव्यास्ते विवादिना ॥ १६६ ॥
गूढास्तु प्रकटाः सभ्यैः काले शास्त्रप्रदर्शनात् ।

जो दोष गुप्त हों उनको सभासद् प्रकट करें, इसका निर्देश— विवाद करने वाला (वादी या प्रतिवादी) एक दूसरे के साधनों के दोषों को कहे और छिपे हुये साधन के दोषों को विचार के लिये नियुक्त पुरुषों के द्वारा विचार करने के समय शास्त्रों के आधार पर प्रकट रूप से कहना चाहिये ।

अन्यथा दूषयन् दण्ड्यः साध्यार्थादेव हीयते ॥ १६७ ॥
विमृश्य साधनं सम्यक् कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ।