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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 383 of 526

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Page 383

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २९७

जिसमें प्रथम शासन के लिये, द्वितीय सूचना के लिये, तृतीय निर्णय के लिये है ।

साक्षिमद्रिक्थ्यभिमतं भागपत्रं सुभक्तियुक् ॥ १७३ ॥
सिद्धिकृच्चान्यथा पित्रा कृतमप्यकृतं स्मृतम् ।

जो भाग पत्र (बटवारे का लेख पत्र) साक्षी से हो और जिसमें धनवाले, दायादों (पट्टीदारों) से स्वीकृत, भलीभांति से विभाग का विषय निश्चित किया हुआ हो वह माननीय होता है । अन्यथा पिता से किया हुआ भी भागपत्र अमाननीय होता है ।

दायादाभिमतं दान-क्रय-विक्रय-पत्रकम् ॥ १७४ ॥
स्थावरस्य ग्रामपादिसाक्षिकं सिद्धिकृत् स्मृतम् ।

और दानपत्र, क्रय (खरीदना) पत्र, विक्रय (बेचना) पत्र यदि स्थावर संपत्तिविषयक हो तो पट्टीदारों द्वारा स्वीकृत, ग्रामाधिपति आदि की साक्षी से युक्त, हो तो माननीय होता है अन्यथा अमाननीय होता है ।

राज्ञा स्वहस्तसंयुक्तं स्वमुद्राचिह्नितं तथा ॥ १७५ ॥
राजकीयं स्मृतं लेख्यं प्रकृतिभिश्च मुद्रितम् ।

**साधनक्षम लेख्य के लक्षण—**राजा के द्वारा अपने हाथ से लिखा हुआ या अपनी मुद्रा (मुहर) से या मन्त्री आदि के द्वारा मुद्रा से मुद्रित लिखित को राजकीय लिखित कहते हैं ।

निवेश्य कालं वर्षं च मासं पक्षं तिथिं तथा ॥ १७६ ॥
वेलां प्रदेशं विषयं स्थानं जात्याकृती वयः ।
साध्यं प्रमाणं द्रव्यं च संख्यां नाम तथात्मनः ॥ १७७ ॥
राज्ञां च क्रमशो नाम निवासं साध्यनाम च ।
क्रमात् पितॄणां नामानि पीडामाहर्तृदायकौ ॥ १७८ ॥
क्षमालिङ्गानि चान्यानि पक्षे सङ्कीर्त्य लेखयेत् ।

पक्ष (दावा) में काल, वर्ष मास, पक्ष, तिथि, समय, प्रदेश, विषय (जिला), स्थान (ग्राम), जाति, आकार, अवस्था, साध्य, प्रमाण, द्रव्य, संख्या और अपना नाम लिखकर क्रमशः राजा का नाम तथा निवास और साध्य का नाम, पिता-पितामहादि का नाम, अपना कष्ट, उपार्जन करने वाला और दान देने वाला इन दोनों का नाम, क्षमा के चिह्न इसके अतिरिक्त अन्यान्य भी जो आवश्यक हों उन्हें कह कर लिखवाये ।

यत्रैतानि न लिख्यन्ते हीनं लेख्यं तदुच्यते ॥ १७९ ॥
भिन्नक्रमं व्युत्क्रमार्थं प्रकीर्णार्थं निरर्थकम् ।