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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 292 of 526

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Page 292

२०६ | शुक्रनीतिः

विषवह्निहिमव्याप्तं कीटजुष्टं न धारयेत् ॥ २८ ॥
निःसारतां न हि प्राप्तं व्यये तावन्नियोजयेत् ।

जो विष, अग्नि तथा पाला से खराब हो गया हो एवं जिसमें कीड़ा पड़ा हो ऐसे धान्यों का संग्रह नहीं करना चाहिये और जब तक निःसार नहीं हो तभी तक धान्यों का व्यय करना चाहिये अर्थात् निःसार होने पर उसे फेंक देना चाहिये ।

व्ययीभूतं तु यद् दृष्ट्वा तत्तुल्यं तु नवीनकम् ॥ २९ ॥
गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन वत्सरे वत्सरे नृपः ।

राजा प्रति वर्ष जो धान्य व्यय करने से चुक जाय उनके स्थान पर उसी जाति के दूसरे नये धान्य यत्नपूर्वक लाकर रख दे ।

ओषधीनां च धातूनां तृणकाष्ठादिकस्य च ॥ ३० ॥
यन्त्रशस्त्राग्नचूर्णभाण्डादेर्वाससां तथा ।
यद्यच्च साधकं द्रव्यं यद्यत्कार्ये भवेत् सदा ॥ ३१ ॥
संग्रहस्तस्य तस्यापि कर्तव्यः कार्यसिद्धयेः ।

ओषधि आदि सब वस्तुओं को संचय करने का निर्देश—ओषधि ( धान्यादि ), धातु ( खान से उत्पन्न पदार्थ ), तृणकाष्ठ आदि, यन्त्र ( मशीन ), अस्त्र, शस्त्र, बारूद, बर्तन, वस्त्र इन सबों के मध्य में जिन २ कार्यों के लिये जो २ द्रव्य उपयोगी हों उनका संग्रह करना राजा के लिये उचित है क्योंकि उनसे समय पर कार्य की सिद्धि होती है ।

संरक्षयेत् प्रयत्नेन संगृहीतं धनादिकम् ॥ ३२ ॥
अर्जने तु महद् दुःखं रक्षणे तच्चतुर्गुणम् ।

संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश—संग्रह किये हुये धान्यादि की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि इनके संग्रह करने में बहुत दुःख उठाना पड़ता है और उससे चौगुना दुःख उनकी रक्षा करने में उठाना पड़ता है ।

क्षणं चोपेक्षितं यत्तद्विनाशं द्राक् समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥

क्षणभर भी रक्षा करने में जिसकी उपेक्षा की जाती है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है ।

आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्तथाऽर्जितविनाशने ।
स्त्रीपुत्राणामपि तथा नान्येषां तु कथं भवेत् ॥ ३४ ॥

और अर्जित ( संगृहीत ) वस्तु के नष्ट हो जाने पर उपार्जन ( संग्रह ) करनेवाले को ही दुःख होता है स्त्री-पुत्रादिकों को वैसा नहीं होता है फिर अन्य लोगों को क्यों दुःख होगा ?