Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 171 of 526

Read in context
Page 171

द्वितीयोऽध्यायः
८५

धर्मनिष्ठ, दृढ अङ्गोंवाले, बाल्य अवस्था को पार किये हुये, तरुण, सदा सेवा करने में कुशल, जो कुछ कार्य स्वामी का उत्तम या चाहे मल-मूत्रादि उठाना आदि नीच भी कार्य हो उन सबों को करने के लिये उद्यत रहनेवाले एवं आज्ञानुसार कार्य करनेवाले हों ऐसे लोगों को राजा 'परिचारक' बनावे ।

शत्रुप्रजाभृत्यवृत्तं विज्ञातुं कुशलाश्च ये ।
ते गूढचाराः कर्त्तव्या यथार्थश्रुतबोधकाः ॥ १८६ ॥

जासूस के लक्षण—जो शत्रु तथा प्रजागण के व्यवहार को जानने के लिये कुशल एवं यथार्थ बातों को सुनकर उन्हें ठीक २ बताने वाले हों ऐसे लोगों को गूढचार ( जासूस ) पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

राज्ञः समीपप्राप्तानां नतिस्थानविबोधकाः ।
दण्डधरा वेत्रधराः कर्त्तव्यास्ते सुशिक्षकाः ॥ १६० ॥

दण्डधारी-आसा-बल्लभधारी के लक्षण—जो राजा के समीप उपस्थित हुये लोगों को प्रणाम करने की रीति एवं बैठने के लिये स्थान को अच्छी तरह से बतानेवाले, विनय तथा शिक्षा जाननेवाले हों ऐसे लोगों को दण्ड तथा बेंत धारण करके राजा के समीप में रहने वाला बनाना चाहिये ।

तन्त्रीकण्ठोत्थितान् सप्तस्वरान् स्थानविभागशः ।
उत्पादयति संवेत्ति ससंयोगविभागिनः ॥ १६१ ॥
अनुरागं सुस्वरं च सतालं च प्रगायति ।
सन्नृत्यं वा गायकानामधिपः स च कीर्त्तितः ॥ १६२ ॥

गायकाधिप के लक्षण—जो वीणा या कण्ठ से निकले हुये स. रि. ग. म, प. ध. नि. इन ७ स्वरों को स्थान-विभाग के अनुसार यथार्थ रूप से पैदा करते हैं एवं संयोग तथा विभाग को साथ अर्थात् मिले हुये या अलग २ उन सबों को भलीभांति समझते हैं और जो राग, स्वर-ताल के साथ गाते या नाचते हैं ऐसे लोगों को गायकों ( गानेवालों ) का अधिपति बनाना चाहिये ।

तथाविधा च पण्यस्त्री निर्लज्जा भावसंयुता ।
शृङ्गाररसतन्त्रज्ञा सुन्दराङ्गी मनोरमा ॥ १६३ ॥
नवीनोत्तुङ्गकठिनकुचा सुस्मितदर्शिनी ।

वेश्या के लक्षण—और पूर्वोक्त रीति से गाने तथा नाचनेवाली, लज्जा न करनेवाली, भाव ( अनुराग ) से युक्त, शृङ्गार रस के तत्त्व को जाननेवाली, सुन्दर अङ्गों वाली, मनको आनन्दित करनेवाली, नवीन अवस्थावाली, ऊँचे, कठिन कुचोंवाली, सुन्दर स्मित ( मुसुकान ) के साथ देखने वाली ( कटाक्ष करनेवाली ) ऐसी जो वेश्या हो उसे राजा अपने यहां रखें ।

ये चान्ये साधकास्ते च तथा चित्तविरञ्जकाः ॥ १६४ ॥