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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 170 of 526

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Page 170
८४शुक्रनीतिः

यथार्थ रूप से उन्हें समझाने में समर्थ हो उसे 'शास्त्रविद्' कहते हैं ।

संहितां च तथा होरां गणितं वेत्ति तत्त्वतः ।
ज्योतिर्विच्च स विज्ञेयस्त्रिकालज्ञश्च यो भवेत् ॥ १८२ ॥

**ज्योतिर्विद् के लक्षण—**जो संहिता ( वाराही संहिता आदि ), होराशास्त्र ( पाराशर ), गणित ( ग्रहलाघवादि ) को यथार्थ रूप से जानता है एवं त्रिकालज्ञ ( भूत, भविष्य, वर्तमान का जानने वाला ) है वह 'ज्योतिर्विद्' कहलाता है ।

बीजानुपूर्व्या मन्त्राणां गुणान्दोषांश्च वेत्ति यः ।
मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नो मान्त्रिकः सिद्धदैवतः ॥ १८३ ॥

**मान्त्रिक के लक्षण—**जो बीजों की आनुपूर्वी के साथ मन्त्रों के गुण तथा दोष को जानता है एवं मन्त्र का नित्य अनुष्ठान करने में लगा हुआ, देवता की सिद्धि प्राप्त करनेवाला होता है उसे 'मान्त्रिक' कहते हैं ।

हेतुलिङ्गौषधीभिर्यो व्याधीनां तत्त्वनिश्चयम् ।
साध्यासाध्यं विदित्वोपक्रमते स भिषक्स्मृतः ॥ १८४ ॥

**वैद्य के लक्षण—**जो हेतु ( कारण ), लिङ्ग ( लक्षण ) तथा औषध-ज्ञान द्वारा व्याधियों का यथार्थ निश्चय एवं साध्यता तथा असाध्यता जानकर चिकित्सा करता है उसे 'भिषक्' ( वैद्य ) कहते हैं ।

श्रुतिस्मृतीतरैर्मन्त्रानुष्ठानैर्देवतार्त्तनम् ।
कर्तुं हिततमं मत्वा यतते स च तान्त्रिकः ॥ १८५ ॥

**तान्त्रिक के लक्षण—**जो श्रुति तथा स्मृति से भिन्न पुराणादि में कहे हुए मन्त्रानुष्ठान द्वारा देवता का पूजन अत्यन्त हितकर समझकर उस पद्धति से यत्न करता है वह 'तान्त्रिक' कहलाता है ।

नपुंसकाः सत्यवाचो सुभूषाश्च प्रियंवदाः ।
सुकुलाश्च सुरूपाश्च योज्यास्त्वन्तःपुरे सदा ॥ १८६ ॥

**अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण—**जो नपुंसक ( हिजड़े ), सत्य बोलने वाले, सुन्दर भूषण धारण करनेवाले, प्रियभाषी, अच्छे कुल में उत्पन्न तथा सुन्दर स्वरूपवाले हों, उन्हें सदा अन्तःपुर ( रनिवास ) के अन्दर में नियुक्त करे ।

अनन्याः स्वामिभक्ताश्च धर्मनिष्ठा दृढाङ्गकाः ।
अबाला मध्यवयसः सेवासु कुशलाः सदा ॥ १८७ ॥
सर्वं यद्यत्कार्यजातं नीचं वा कर्तुमुद्यताः ।
निदेशकारिणो राज्ञा कर्त्तव्याः परिचारकाः ॥ १८८ ॥

**परिचारक के लक्षण—**जो अनन्य भाव से स्वामी की भक्ति करनेवाले,