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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 172 of 526

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Page 172

८६ | शुक्रनीतिः

सुभृत्यास्तेपि सन्धार्या नृपेणात्महिताय च ।
वेश्या-भृत्य के लक्षण— और इसके अतिरिक्त अन्य वेश्याओं के भृत्य जो मनोऽभिलषित कार्य के करने में चतुर, चित्त को विशेष रूप से प्रसन्न करने वाले ऐसे अच्छे भृत्य हों उन्हें अपने हित के लिये राजा को रखना चाहिये ।

वैतालिकाः सुकवयो वेत्रदण्डधराश्च ये ॥ १६५ ॥
शिल्पज्ञाश्च कलावन्तो ये सदाप्युपकारकाः ।
दुर्गुणासूचका भाणा नर्तका बहुरूपिणः ॥ १६६ ॥
आरामकृत्रिमवनकारिणो दुर्गकारिणः ।
महानालिकयन्त्रस्थगोलैर्लक्ष्यविभेदिनः ॥ १९७ ॥
लघुयन्त्राग्नेयचूर्णबाणगोलासिकारिणः ।
अनेकयन्त्रशास्त्रास्त्रधनुस्तूणादिकारकाः ॥ १९८ ॥
स्वर्णरत्नाद्यलङ्कारघटका रथकारिणः ।
पाषाणघटका लोहकारा धातुविलेपकाः ॥ १९९ ॥
कुम्भकाराः शौल्विकाश्च तक्षाणो मार्गकारकाः ।
नापिता रजकाश्चैव वासिका मलहारकाः ॥ २०० ॥
वार्ताहराः सौचिकाश्च राजचिह्नाग्रधारिणः ।
भेरीपटहगोपुच्छ-शंखवेणवादिभिःस्वनैः ॥ २०१ ॥
ये व्यूहरचका यानव्यपथानादिबोधकाः ।
नाविकाः खनका व्याधाः किराता मारिका अपि ॥ २०२ ॥
शस्त्रसंमार्जनकरा जलधान्यप्रवाहकाः ।
आपणिकाश्च गणिका वाद्यजायाप्रजीविनः ॥ २०३ ॥
तन्तुवायाः शाकुनिकाश्चित्रकाराश्च चर्मकाः ।
गृहसंमार्जकाः पात्रधान्यवस्त्रप्रमार्जकाः ॥ २०४ ॥
शय्यावितानास्तरण-कारकाः शासका अपि ।
आमोदास्वेदसद्धूपकारास्ताम्बूलिकास्तथा ॥ २०५ ॥
हीनाल्पकर्माणश्चैते योज्याः कार्यानुरूपतः ।

वैतालिक तथा शिल्पशों को पास में रखने का निर्देश— और जो वैतालिक (राजा की स्तुति करके जगानेवाले), सुकवि, वेत या दण्ड धारण करनेवाले (रक्षक विशेष), शिल्प कला के पण्डित, कलाओं (६४ प्रकार की कामविद्या) में कुशल, सदा हित करनेवाले, दूसरों के दोषों की सूचना देनेवाले, भाण (परिहास के पण्डित), बहुरूपिया, बगीचा तथा बनावटी जंगल बनाने में कुशल, दुर्ग (किला) बनानेवाले, महानालिक यन्त्रों (बड़ी तोपों) के अन्दर रखे हुवे गोलों से शत्रुओं पर लक्ष्य-भेद (निशाना) करनेवाले (गोलन्दाज), लघु