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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 139 of 526

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Page 139

प्रथमोऽध्यायः ५३

राजा के कर्तव्य—और राजा अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये 'आप सबसे अधिक दाता, शूर तथा धार्मिक हैं, इस वचन को सुनानेवाले यदि वञ्चक हैं और उनके वचनों को सुनकर यदि किसी के राग, लोभ या भय से मन्त्री लोग मूक हो जायें तो ऐसे लोगों को अनुमत (सच कहनेवाला) न समझे। और उनके मतों को युक्ति (प्रमाण) सहित पृथक् २ लिखाकर अपने मत से विचार करे। और जो बहुसम्मत हो उसे करे (वैसा निर्णय करे)।

गजाश्वरथपश्वादीन् भृत्यान्दासांस्तथैव च ।
संभारान्सैनिकान् कार्यक्षमान्ज्ञात्वा दिने दिने ॥ ३६७ ॥
संरक्षयेत्प्रयत्नेन सुजीर्णान् संत्यजेत्सुधीः ।

बुद्धिमान राजा हाथी, घोडे, रथ, पशु आदि, भृत्य (नौकर) दास (गुलाम), सामग्री, सैनिक इन सबों में जो कार्य के योग्य हों उन्हें समझ कर प्रयत्नपूर्वक उनकी रक्षा करे जो पुराने हों उन्हें प्रतिदिन अलग कर दे।

शतक्रोशभवां वार्तां हरेदेकदिनेन वै ॥ ३६८ ॥
सर्वविद्याकलाभ्यासे शिक्षयेद् वृत्तिपोषितान् ।
समाप्तविद्यं संदृष्ट्वा तत्कार्यं तं नियोजयेत् ॥ ३६९ ॥
विद्याकलोत्तमान्दृष्ट्वा वत्सरे पूजयेच्च तान् ।
विद्याकलानां वृद्धिः स्यात्तथा कुर्यान्नृपः सदा ॥ ३७० ॥

और १०० क्रोश की बातें १ दिन में ही जान ले। और वृत्ति देकर लोगों को सभी प्रकार की विद्याओं तथा कलाओं की शिक्षा दिलावे। और अध्ययन समाप्त हुआ समझकर उन्हें उनके योग्य कार्यों में नियुक्त कर दे। एवं विद्या तथा कला में जो अत्यधिक निपुण हों उनका प्रतिवर्ष आदर-सत्कार करे। इस प्रकार से विद्या तथा कला की वृद्धि जिस भांति से हो वैसा प्रयत्न राजा को सदा करना चाहिये।

पृष्ठाग्रगान्क्रूरवेषान्नतिनीतिविशारदान् ।
सिद्धास्त्रनग्नशस्त्रांश्च भटानारान्नियोजयेत् ॥ ३७१ ॥

राजा अपने आगे-पीछे चलनेवाले ऐसे सैनिक लोगों को पास में नियुक्त करे जो क्रूर वेषवाले, नमन करने एवं नीति में कुशल, सिद्ध (चलाने के लिये प्रस्तुत) अस्त्र तथा नग्न सङ्ग आदि शस्त्रों को धारण किये हों।

पुरे पर्यटयेन्नित्यं गजस्थो रंजयन्प्रजाः ।

राजा हाथी पर बैठकर प्रजा का मनोरञ्जन करता हुआ नगर में नित्य पर्यटन करे।

राजयानारूढितः किं राज्ञा श्वा न समोपि च ॥ ३७२ ॥
शुना समो न किं राजा कविभिर्भाव्यतेऽजसा ।