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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 140 of 526

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Page 140

५४ | शुक्रनीतिः

राजा की सवारी पर चढ़ा हुआ कुत्ता क्या राजा के समान और राजा कुत्ता के समान पण्डितों द्वारा वस्तुतः नहीं समझा जाता है अर्थात् अवश्य समझा जाता है।

अतः स्वबांधवैर्मित्रैः स्वसाम्यप्रापितैर्गुणैः ॥ ३७३ ॥
प्रकृतिभिर्नृपो गच्छेन्न नीचैस्तु कदाचन ।

अतः राजा अपने बान्धव, मित्र तथा गुणों के द्वारा अपनी समता को प्राप्त किये हुये लोग, प्रकृति ( मन्त्री आदि ) के साथ गमन करे, किन्तु कभी भी नीच पुरुषों के साथ गमन न करे।

मिथ्यासत्यसदाचारैर्नीचः साधुः क्रमात्स्मृतः ॥ ३७४ ॥
साधुभ्योऽतिस्वमृदुत्वं नीचाः संदर्शयन्ति हि ।

क्रम से मिथ्या के द्वारा व्यक्ति नीच तथा सत्य और सदाचार द्वारा साधु समझा जाता है। और साधु की अपेक्षा नीच लोग अपनी मृदुता को ज्यादा दिखाते हैं।

ग्रामान्पुराणि देशांश्च स्वयं संवीक्ष्य वत्सरे ॥ ३७५ ॥
अधिकारिगणैः काश्च रंजिताः काश्च कर्षिताः ।
प्रजास्तासां तु वृत्तेन व्यवहारं विचिन्तयेत् ॥ ३७६ ॥
न भृत्यपक्षपाती स्यात्प्रजापक्षं समाश्रयेत् ।

राजा को प्रतिवर्ष राज्य में भ्रमण कर देश के अधिकारियों के निरीक्षण का निर्देश— प्रतिवर्ष ग्राम, नगर तथा देश का स्वयं निरीक्षण करके अधिकारियों ने किन प्रजाओं का मनोरंजन किया और किन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, इसमें प्रजासम्बन्धी जो सत्य व्यवहार हो उसका विचार करे। अधिकारी भृत्यों का पक्षपाती न होकर प्रजा का पक्षपाती होना राजा के लिये उचित है।

प्रजाशतेन संद्विष्टं संत्यजेदधिकारिणम् ॥ ३७७ ॥
अमात्यमपि संवीक्ष्य सकृदन्यायगामिनम् ।
एकांते दंडयेत्स्पष्टमभ्यासागस्कृतं त्यजेत् ॥ ३७८ ॥
अन्यायवर्तिनां राज्यं सर्वस्वं च हरेन्नृपः ।

यदि १०० प्रजा मिलाकर किसी अधिकारी के विरुद्ध आवेदन पत्र भेजें तो उस ( अधिकारी ) को राजा निकाल दे। और यदि मन्त्री एक बार अन्याय करनेवाला दिखाई दे तो उसे एकान्त में दण्ड दे। और यदि बारंबार अपराध करनेवाला हो तो उसे सबके समक्ष दण्ड दे और निकाल दे। अन्यायी अधिकारियों के राज्य तथा सर्वस्व को हर ले।

जितानां विषये स्थाप्यं धर्माधिकरणं सदा ॥ ३७९ ॥
भृतिं दद्यान्निर्जितानां तच्चारित्र्यानुरूपतः ।