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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 138 of 526

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Page 138

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शुक्रनीतिः

दक्षिण भाग में पृथक् २ आसनों पर बैठें। नाना के कुल के श्रेष्ठ पुरुष, मन्त्रिगण, बान्धव, श्वशुर, साला ये सब वामभाग में बैठने के अधिकारी हैं।

वामदक्षिणपार्श्वस्थौ जामाता भगिनीपतिः ॥ ३५८ ॥
स्वसदृशः समीपे वा स्वार्द्धासनगतः सुहृत् ।

वाम-दक्षिण भाग में दामाद तथा बहनोई बैठें। अपने समान हैसियतवाले अथवा मित्र सिंहासन के समीप या अर्धभाग के ऊपर बैठें।

दौहित्रभागिनेयानां स्थाने स्युर्दत्तकादयः ॥ ३५९ ॥
भागिनेयाश्च दौहित्राः पुत्रादिस्थानसंश्रिताः ।

दौहित्र तथा भानजों के स्थान में दत्तक आदि बैठें। भानजे तथा दौहित्र आदि पुत्रादि के स्थान पर बैठें।

यथा पिता तथा चार्यः समश्रेष्ठासने स्थितः ॥ ३६० ॥
पार्श्वयोरग्रतः सर्वे लेखका मंत्रिपुष्ठगाः ।

जैसे, पिता वैसे आचार्य्य पूज्य होते हैं अतः उन्हें सिंहासन के समान श्रेष्ठ आसन देना चाहिये। और अग्रभाग में दोनों तरफ मन्त्रियों के पीछे सभी लेखकवर्ग बैठें।

परिचारगणाः सर्वे सर्वेभ्यः पृष्ठसंस्थिताः ॥ ३६१ ॥
स्वर्णदंडधरौ पार्श्वे प्रवेशानतिबोधकौ ।

और सम्पूर्ण परिचार (सेवक) गण सबों के पीछे बैठें। एवं सिंहासन के दोनों पार्श्व (बगल) में सुवर्ण के दण्ड को लिये हुए लोगों के प्रवेश तथा प्रणाम करने की सूचना राजा को देने के लिये दो मनुष्य खड़े रहें।

विशिष्टचिह्नयुप्राजा स्वासने प्रविशेत्सुखम् ॥ ३६२ ॥
सुभूषणः सुवसनः कवची मुकुटान्वितः ।
सिद्धास्त्रनग्नशस्त्रस्सन् सावधानमनाः सदा ॥ ३६३ ॥

**राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश—**राजा सदा सावधान-चित्त होकर सुन्दर भूषण, वस्त्र, कवच तथा मुकुट धारण किये हुए, चलाने के लिये प्रस्तुत किये हुये अस्त्र तथा नग्न (म्यान से निकाले हुये) शस्त्र (तलवार) को लिये हुये, विशिष्ट राजचिह्नों से विभूषित होकर सिंहासन पर सुखपूर्वक बैठें।

सर्वस्मादधिको दाता शूरस्त्वं धार्मिको ह्यसि ।
इति वाचं न शृणुयाच्छ्लाघका वंचकास्तु ते ॥ ३६४ ॥
रागाल्लोभाद्भयाद्राज्ञः स्युर्मूका इव मंत्रिणः ।
नताननुमतान्विद्वान्नृपतिः स्वार्थसिद्धये ॥ ३६५ ॥
पृथक्पृथङ्म॒तं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् ।
विमृशेत्स्वमतेनैव यत्कुर्याद्बहुसम्मतम् ॥ ३६६ ॥