शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३६ | शुक्रनीतिः
यामिकै रक्षितो नित्यं नाळिकास्त्रैश्च संयुतः ।
सुबहुदृढगुल्मश्च सुगवाक्षप्रणालिकः ॥ २३९ ॥
स्वहीनप्रतिप्राकारो ह्यसमीपमहीधरः ।
परिखा च ततः कार्या खाताद् द्विगुणविस्तरा ॥ २४० ॥
नातिसमीपप्राकारा ह्यगाधसलिला शुभा ।
राजा के योग्य दुर्ग बनाने का निर्देश— चौकीदारों से नित्य सुरक्षित तथा नालिकास्त्रों (तोपों) से युक्त भलीभांति से बहुत से कुशादि के गुच्छे जिस पर उगे हुये हों और जिसमें सुन्दर रीति से खिड़कियों की नालियां बनी हों, एवं जिसके बाद में उससे छोटा दूसरा प्राकार बना हो और जिसके समीप में पर्वत न हो ऐसा प्राकार (परकोटा) बनाना चाहिये। और उसके बाद ऐसी परिखा (खाई) बनानी चाहिये। जिसकी चौड़ाई उसकी गहराई से दुगुनी हो। और जिसके अत्यन्त समीप में प्राकार (परकोटा) न खिंचा हो, एवं जिसमें अगाध जल भरा हो।
युद्धसाधनसम्भारैः सुयुद्धकुशलैर्विना ॥ २४१ ॥
न श्रेयसे दुर्गवासो राज्ञः स्याद् बन्धनाय सः ।
युद्ध करने के योग्य साधन-सामग्रियों (शस्त्रास्त्र, गोला, बारूद) एवं युद्ध में निपुण योद्धाओं के बिना दुर्ग में केवल निवास करना राजा के लिये कल्याणकारक नहीं होता है प्रत्युत उससे उसका बन्धन हो जाता है।
राज्ञा राजसभा कार्या सुगुप्ता सुमनोरमा ॥ २४२ ॥
त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा सप्तकोष्ठैः सुविस्तृता ।
दक्षिणोदक्तयादीर्घा प्राक्प्रत्यग्द्विगुणाथवा ॥ २४३ ॥
त्रिगुणा वा यथाकाममेकभूमिर्द्विभूमिका ।
त्रिभूमिका वा कर्तव्या सोपकार्याशिरोगृहा ॥ २४४ ॥
परितः प्रतिकोष्ठे तु वातायनविराजिता ।
राजसभा कैसी बनानी चाहिये इसका निर्देश— राजा ऐसी राजसभा बनवावे, जो भलीभांति सुरक्षित, अत्यन्त सुन्दर दक्षिण से उत्तर की तरफ लम्बी अथवा पूर्व से पश्चिम की तरफ दुगुनी किंवा तिगुनी लम्बी हो। एवं अपनी इच्छानुसार एकमंजिल, दुमंजिल या तीन मंजिल की हो, और जिसमें ऊपर के गृह में शामियाना तना हो और जिसके प्रत्येक गृहों में खिड़कियां हों।
पार्श्वकोष्ठात्तु द्विगुणो मध्यकोष्ठस्य विस्तरः ॥ २४५ ॥
पञ्चमांशधिकं त्वौच्चं मध्यकोष्ठस्य विस्तरात् ।
वस्तारेण समं त्वौच्चं पञ्चमांशाधिकं तु वा ॥ २४६ ॥