शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextप्रथमोऽध्यायः
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बगल के कमरे की अपेक्षा मध्य के कमरे का विस्तार दूना होना चाहिये। और उसकी ऊंचाई कमरे के विस्तार से पञ्चमांश अधिक अथवा विस्तार के समान होना चाहिये।
कोष्ठकानां च भूमिर्वा छदिर्वा तत्र कारयेत् ।
द्विभूमिके पार्श्वकोष्ठे मध्यं त्वेकभूमिकम् ॥ २४७ ॥
पृथक्स्तम्भान्तसत्कोष्ठा चतुर्मार्गागमा शुभा ।
जलोर्ध्वपातियन्त्रैश्च युता सुस्वरयन्त्रकैः ॥ २४८ ॥
वातप्रेरकयन्त्रैश्च यन्त्रैः कालप्रबोधकैः ।
प्रतिष्ठिता च स्वादर्शैस्तथा च प्रतिरूपकैः ॥ २४६ ॥
एवंविधा राजसभा मन्त्रार्था कार्यदर्शने ।
कमरों के ऊपर छत या खपड़ों का छाजन बनाना चाहिये। दुमञ्जिले यदि बगल के कमरे हों तो मध्य का कमरा एक-मञ्जिला होना चाहिये। पृथक् २ स्तम्भों के अन्त में अच्छे कमरों से युक्त, चारों दिशाओं में बने हुए द्वारों से सुशोभित जलयन्त्रों (फव्वारों) तथा सुन्दर स्वरवाले बाजों से हवा पहुंचानेवाले यन्त्रों (यन्त्र-चालित, पङ्खों) से, तथा समयसूचक यन्त्रों (घड़ी) एवं सुन्दर शीशों तथा चित्रों से सुसज्जित इस प्रकार की राजसभा विचार करने एवं कार्य देखने के लिये होनी चाहिये।
तथाविधामात्यलेख्यसभ्याधिकृतशालिकाः ॥ २५० ॥
कर्तव्याः प्रागुदक्वेतास्तदर्थाश्च पृथक्पृथक् ।
शतहस्तमितां भूमिं त्यक्त्वा राजगृहात्सदा ॥ २५१ ॥
**मन्त्री आदि के लिये भवन बनाने का निर्देश—**इसी प्रकार से मन्त्री, लेख तथा सभा के सदस्य (कौंसिल के मेम्बर) तथा अधिकारी पुरुषों के कमरे होने चाहिये। इन सब कमरों को पूर्वोक्त प्रत्येक कार्यों के लिये पृथक् पृथक् सदा राजभवन से १०० हाथ की दूरी पर बनवाना चाहिये।
तद्वद्द्विशतहस्तां प्राक्सेनासंवेशनार्थिकाम् ।
आराद्राजगृहस्यैव प्रजानां निलयानि च ॥ २५२ ॥
सधनश्रेष्ठजात्यानुक्रमतश्च सदा बुधः ।
समन्ताद्धि चतुर्दिक्षु विन्यसेच्च ततः परम् ॥ २५३ ॥
**सेनानिवेश-स्थान तथा प्रजावर्गों के स्थानों का क्रम—**राजभवन से उत्तर अथवा पूर्व सेनाओं के रहने के लिये गृह होना चाहिये। उसके बाद प्रजाओं का गृह राजभवन से दूर होना चाहिये। धनिक और उत्तम वंशवालों का क्रमानुसार राजभवन के चारो दिशाओं में गृह होना चाहिये।
प्रकृत्यनुप्रकृतयो ह्यधिकारिगणस्ततः ।