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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 121 of 526

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Page 121

प्रथमोऽध्यायः ३५

तत्रैव कल्पयेद् द्वारं नान्यथा तु कदाचन ।
वातायनं पृथक्कोष्ठे कुर्याद्वाह्यत्सुखावहम् ॥ २३२ ॥
उन्हीं भागों में द्वार बनाना चाहिये इससे अन्य भागों में कभी नहीं द्वार बनाना चाहिये । और प्रत्येक कोठरियों में सुविधानुसार हवा आने के लिये जंगले बनवावे ।

अन्यगृहद्वारविद्धं गृहद्वारं न चिन्तयेत् ।
वृक्षकोणस्तम्भमार्गपीठकूपैश्च वेधितम् ॥ २३३ ॥
अन्य किसी गृह के द्वार से विद्ध (वेध खाता हुआ) गृह का द्वार नहीं बनाना चाहिये। एवं वृक्ष, कोण, स्तम्भ, मार्ग बैठने का चबूतरा तथा कूप से भी विद्ध गृहद्वार नहीं होना चाहिये ।

प्रासादमण्डपद्वारे मार्गवेधो न विद्यते ।
गृहपीठं चतुर्थांशमुद्रा यस्य प्रकल्पयेत् ॥ २३४ ॥
प्रासाद (राजा या देवता का मन्दिर) और मण्डप के द्वार में मार्ग के वेध का विचार नहीं करना चाहिये । गृहपीठ का प्रमाण प्रासाद या मण्डप के चतुर्थांश तुल्य होना चाहिये ।

प्रासादानां मण्डपानामर्धांशं वाऽपरे जगुः ।
परवातायनैर्विद्धं नापि वातायनं स्मृतम् ॥ २३५ ॥
कोई २ ऋषि प्रासाद या मण्डप के अर्द्धांश तुल्य गृहपीठ का प्रमाण बताते हैं। दूसरे जंगलों से जंगला विंधा हुआ नहीं होना चाहिये ।

विस्ताराधार्शामण्डोच्चाच्छर्द्दिः खर्परसम्भवा ।
पतितं तु जलं तस्यां सुखं गच्छति वाप्यधः ॥ २३६ ॥
हीना निम्ना छदिर्न स्याद्याष्टकोष्ठस्य विस्तरः ।
गृह के विस्तार के अर्द्धांश के तुल्य खपड़े की छाजन की मूल ऊंचाई होनी चाहिये। जिससे उसके ऊपर गिरी हुई जल की धारा सुखपूर्वक नीचे गिर जाय । जैसा कोठरी का विस्तार हो उससे हीन या निम्न उसका छाजन नहीं होना चाहिये ।

स्वोच्छ्रायस्यार्धमूलो वा प्राकारः सममूलकः ॥ २३७ ॥
तृतीयांशकमूलो वा ह्युच्छ्रायार्धप्रविस्तरः ।
उच्छ्रितस्तु तथा कार्यो दस्युभिर्न विलंघ्यते ॥ २३८ ॥
और अपनी ऊँचाई से आधा या समान मूल भाग जिसका है ऐसा प्राकार (चाहारदीवारी) होना चाहिये । अथवा ऊंचाई के तृतीयांश के बराबर मूलभाग एवं ऊंचाई की आधी चौड़ाई प्राकार की होनी चाहिये । और उसकी ऊंचाई उतनी होनी चाहिये, जिससे डाकू लोग उसे नाघ न सकें ।