श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटीका समुदाय की) (२५
तबतौ लजानौ हिये कृष्ण पै रिसानौ नृप, चाहौ सोई ठानौ मेरे संग कोऊ जन है।
भोर ही पधारौ अब यही उर धारौ और, भूलि न विचारौ कही भली जोपै मन है॥८०॥
कही सब रीति सुनि धर्मपुत्र प्रीति भई, करी लै रसोई कृष्ण द्रोपदी सिखाई है।
जेतिक प्रकार सब व्यंजन सुधारि करो, आजु तेरे हाथनि की होति सफलाई है॥
ल्याये जा लिवाय कहै 'बाहिर जिमाय देवो', कही प्रभु 'आपु ल्यावो अँक भरि भाई है'।
आनिकै बैठायो पाकशाल में रसाल ग्रास, लेत बाज्यो शंख हरि दण्ड की लगाई है॥८१॥
'सीत-सीत प्रति क्यों न बाज्यो? कछु लाज्यो कहा' भक्ति को प्रभाव तैं न जानत यों जानिये।
बोल्यो अकुलाय 'जाय पूछिये जू द्रोपदी कौं, मेरो दोष नाहिं यह आपु मन आनिये॥
मानि साँच बात जातिबुद्धि आई देखि याहि, सबही मिलाई मेरी चातुरी बिहानिये।
पूँछे ते कही है बालमिकी 'मैं मिलायौं यातें आदि प्रभु पायो पाऊँ स्वाद उन मानिये'॥८२॥
नवाह परायण प्रथम विश्राम
श्रीरुक्मांगदजी
रुक्मांगद बाग शुभ गन्ध फूल पागि रह्यो, करि अनुराग देवबधू लेन आवहीं।
रहि गई एक काँटो चुभ्यो पग बैंगन को, सुनि नृप माली पास आये सुख पावहीं॥
कहौ को उपाय स्वर्गलोक को पठाइ दीजै, 'करै एकादशी जल धरै कर जावहीं'।
व्रत को तो नाम यहि ग्राम कोऊ जानै नाहिं, 'कीनो हो अंजान काल्हि लावो गुन गावहीं'॥७३॥
फेरी नृप डाँड़ी सुनि बनिक की लौंड़ी, भूखी रही ही कनौड़ी निसि जागी उन मारियै।
राजा ढिंग आनि करि दियो व्रत दान गई, तिया यों उड़ानि निज लोक को पधारियै॥
महिमा अपार देखि भूप ने विचारी याको कोउ अन्न खाय ताको बाँधि मारि डारियै।
याही के प्रभाव भावभक्ति विस्तार भयो, नयो चोज सुनो सब पुरी लै उधारियै॥८४॥
श्रीरुक्मांगदजी की पुत्री
एकादशी व्रत की सचाई लै दिखाई राजा, सुता की निकाई सुनौ नीके चित लाइकै।
पिता घर आयो पति भूख ने सतायो, अति माँगे तिया पास नहीं दियो यह भाइकै॥
आजु हरिवासर सो तासर न पूजै कोऊ, डर कहा मीच को यों मानी सुख पाइकै।
तजे उन प्रान पाये वेगि भगवान् वधू, हिये सरसान भई कह्यौं पन गाइकै॥८५॥
टीका समुदाय की
सुनौ हरिचन्द कथा व्यथा बिन द्रव्य दियो, तथा नहीं राखी बेचि सुत तिया तन है।
सुरथ सुधन्वा जू सौं दोष के करत मरे, शंख औ लिखित विप्र भयो मैलो मन है॥