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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

२४) (श्री भक्तमाल
महर्षि श्रीबाल्मीकिजी
जन्म पुनि जन्म को न मेरे कछु सोच अहो ! सन्तपद कंज रेनु सीस पर धारिये।
पराचीनबर्हि आदि कथा परसिद्ध जग, उभै बाल्मीकि बात चित्त तैं न टारिये।।
भये भील संग भील ऋषि संग ऋषि भये, भये राम दरसन लीला विसतारिये।
जिन्हें जग गाय किहूँ सकै ना अघाय चाय भाय भरि हियो भरि नैन भरि ढारिये।। ७४ ।।
मास परायण तीसरा विश्राम
श्वपच श्रीबाल्मीकिजी
हुतो बालमीकि एक सुपच सुनाम ताको, श्याम लै प्रकट कियो भारत में गाइये।
पाण्डवन मध्य मुख्य धर्मपुत्र राजा आप, कीनो यज्ञ भारी ऋषि आये भूमि छाइये।।
ताको अनुभाव शुभ शंख सो प्रभाव कहै, जोपै नहीं बाजै तो अपूरनता आइये।
सोई बात भई वह बाज्यो नाहिं सोच पर्यौ, पूछैं प्रभु पास याकी न्यूनता बताइये।। ७५ ।।
बोले कृष्णदेव याको सुनो सब भेव, ऐपै नीके मानि लेव बात दुरी समुझाइये।
भागवत सन्त रसवन्त कोऊ जेंयो नाहिं, ऋषिन समूह भूमि चहुँदिसि छाइये।।
जोपै कहौ भक्त नाहीं, नाहीं कैसे कहौँ गहाँ, गाँस एक और कुल जाति सो बहाइये।
दासनि को दास अभिमान की न बास कहूँ, पूरन की आस तोपै ऐसो लै जिवाइये।। ७६ ।।
ऐसो हरिदासपुर आस-पास दीसै नाहिं, बास बिनु कोऊ लोक लोकन में पाइये।
तेरेई नगर माँझ निसिदिन भोर साँझ, आवै जाय ऐपै काहू बात न जनाइये।।
सुनि सब चौंकि परे भाव अचरज भरै, हरे मन नैन अजू ! वेगि ही बताइये।
कहा नाम? कहाँ ठाम? जहाँ हम जाय देखें, लेखैं करि भाग धाय पाँय लपटाइये।। ७७ ।।
जिते मेरे साधु कभूँ चाहैं न प्रकास भयौ, करौ जो प्रकास मानैं महा दुखदाइये।
मोको पर्यो सोच यज्ञपूरन की लोच हिये, लिये वाको नाम निजि ग्राम तजि जाइये।।
ऐसौ तुम कहौ जामें रहो न्यारे प्यारे ! सदा, हमहीं लिवाइ ल्याइ नीकें कै जिमाइये।
जावो बालमीकि घर बड़ो अवलीक साधु, कियो अपराध हम दियो जो बताइये।। ७८ ।।
अर्जुन और भीमसेन चलेई निमन्त्रन को, अन्तर उघारि कही भक्तिभाव दूर है।
पहुँचे भवन जाइ चहुँदिसि फिरि आइ, परे भूमि झूमि घर देख्यो छबि पूर है।।
आये नृपराजनि को देखि तजे काजनि को, लाजनि सौं काँपि-काँपि भयो मन चूर है।
पाँयनि को धारिये जू जूठन को दारिये जू, पापग्रह टारिये जू कीजे भाग भूर है।। ७९ ।।
जूठनि लै डारौं सदा द्वार को बुहारौं नहीं, और कौं निहारौं अजू ! यही साँचोपन है।
कहो कहा? जेंवो कछू पाछे लै जिंवावो हमें, जानी गई रीति भक्तिभाव तुम तन है।