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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

by गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी

DevanagariHindipublished195 pages

Page 36 of 195

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Page 36

श्रीश्रुतिदेवजी) (२३
गये दुर्वासा ऋषि वन में पठाये नीच धर्मपुत्र बोले विनय आवै पन लये हैं।
भोजन निवारि तिया आइ कही सोच पर्यो, चाहैं तनु त्याग्यो ‘कह्यो कृष्ण कहूँ गये हैं’॥७१॥
सुन्यो भागवती को वचन भक्तिभाव भर्यो, कर्यो मन आये स्याम पूजे हिये काम है।
आवत ही कही मोहि भूख लागी देवो कछु, महा सकुचाये माँगे प्यारो नहीं धाम है॥
विश्व के भरनहार धरे हैं अहार अजू, हमसों दुरावो कही वानी अभिराम है।
लग्यो शाक पत्र पात्र जल संग पाइ गये, पूरन त्रिलोकी विप्र गिने कौन नाम है॥७२॥
पद पंकज वन्दौं सदा, जिनके हरि नित उर बसैं॥
योगेश्वर श्रुतिदेव अंग मुचुकुन्द प्रियव्रत जेता।
पृथु परीक्षित शेष, सूत शौनक परचेता॥
सतरूपा त्रयसुता सुनीति सती सबही मन्दालस।
यज्ञपत्नि ब्रजनारि, किये केशव अपने वश॥
ऐसे नर नारी जिते तिनहीं के गाऊँ जसैं।
पद पंकज वन्दौं सदा, जिनके हरि नित उर बसैं॥१०॥
श्रीश्रुतिदेवजी
जिनहीं के हरि नित उर बसैं तिनहीं की, पदरेनु चैन-दैन आभरन कीजिये।
योगेश्वर आदि रस स्वाद में प्रवीन महा, विप्र श्रुतिदेव ताकी बात कही दीजिये॥
आये हरि घर देखि गयो प्रेम भरि हियो, ऊँचो कर करि पट फेरि मति भीजिये।
जिते साधु संग तिन्हें विनय न प्रसंग कियो, कियो उपदेश ‘मोसों बाढ़ पाँव लीजिये’॥७३॥
अंघ्री अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं॥
प्राचीनबर्हि सत्यव्रत, रहूगण सगर भगीरथ।
बाल्मीकि मिथिलेश, गये जे जे गोविन्द पथ॥
रुक्मांगद हरिचन्द, भरत दधीचि उदारा।
सुरथ सुधन्वा शिविर, सुमति अति बलि की दारा॥
नील मोरध्वज ताम्रध्वज, अलरक कीरति राचिहौं।
अंघ्री अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं॥११॥