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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

२२) (श्री भक्तमाल
बोलि नीच जाति बात कही तुम जावो मठ, आवै तहाँ कोऊ मारि डारौ मोहि भाई है।
चन्द्रहास जू सौं भाष्यो देवी पूजि आवो आज, मेरी कुल पूज सदा रीति चलि आई है।।६५।।
चल्योई करन पूजा देशपति राजा कही, मेरे सुत नाहीं राज वाही को लै दीजिये।
सचिव सुवन सौं जु कह्यो तुम लावो जावो, पावो नहीं फेरि समय अब काम कीजिये।।
दौर्यौ सुख पाइ चाइ मग ही में लियो जाइ, दियो सो पठाइ नृप रंग माहिं भीजिये।
देवी अपमान ते न डरो सनमान करौं, जात मारि डार्यो यासों भाष्यो भूप लीजिये।।६६।।
काहू आनि कही सुत तेरो मारो नीचनि ने, सींचन सरीर दृग नीर झरी लागी है।
चल्यो ततकाल देखि गिर्यो ह्वै विहाल, सीस पाथर सौं फोरि मर्यो ऐसो ही अभागी है।।
सुनि चन्द्रहास चलि वेगि मठ पास आये, ध्याये पग देवता के काटे अंग रागी है।
कह्यो तेरो द्वेषी याहि क्रोध करि मार्यो मैं ही, उठैं दोऊ दीजै दान जिये बड़भागी है।।६७।।
कर्यो ऐसो राज सब देश भक्तराज कर्यो, ढिंग को समाज ताकी बात कहा भाखिये।
हरि-हरि नाम अभिराम धाम-धाम सुने, और काम कामना न सेवा अभिलाखिये।।
काम क्रोध लोभ मद आदि लैके दूरि किये, जिये नृप पाइ ऐसो नैननि में राखिये।
कही जिती बात आदि अन्त लौं सुहाति हिये, पढ़ें उठि प्रात फल जैमिनि में साखिये।।६८।।
श्रीमैत्रेयजी
कौषारव नाम सो बखान कियो नाभा जू ने मैत्रेय अभिराम ऋषि जानि लीजै बात में।
आज्ञा प्रभु दई जाहु विदुर है भक्त मेरौ करौ उपदेस रूप गुन गान-गात में।।
चित्रकेतु प्रेमकेतु भागवत ख्यात जाते पलट्यो जनम प्रतिकूल फल घात में।
अक्रूर आदि ध्रुव भये सब भक्तभूप उद्धव से प्यारेन की ख्याति पात-पात में।।६६।।
श्रीकुन्तीजी
कुन्ती करतूति ऐसी करै कौन भूतप्राणी, माँगति विपत्ति जासों भाजैं सब जन हैं।
देख्यो मुख चाहौं लाल ! देखे बिनु हिये शाल, हूजिये कृपाल नहीं दीजै वास वन है।।
देखि विकलाई प्रभु आँखि भरि आई फेरि घर ही को लाई कृष्ण प्रान तन धन है।
श्रवन वियोग सुनि तनक न रह्यो गयो, भयो वपु न्यारो अहो ! यही साँचो पन है।।७०।।
श्रीद्रौपदीजी
द्रोपदी सती की बात कहै ऐसो कौन पटु ? खैचत ही पट, पट कोटिगुने भये हैं।
'द्वारका के नाथ!' जब बोली तब साथ हुते द्वारका सौं फेरि आये भक्तवाणी नये हैं।।