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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

२०) (श्री भक्तमाल
तिया सकुचाय कर काटि डारौं हाय प्रान-प्यारे को खवाई छीलि छीलिका न भाई है।
हित ही की बातें दोऊ पार पावैं नाहिं कोऊ, नीके कै लड़ावै सोई जानै यह गाई है ॥५२॥
मास परायण दूसरा विश्राम
श्रीसुदामाजी
बडो निसकाम सेर चूनहू न धाम ढिग, आई निज भाम प्रीति हरि सौं जनाई है।
सुनि सोच पर्यो हियो खरो अरबर्यो मन, गाढ़ो लैके कर्यो ‘बोल्यो हाँ जू सरसाई है’।
‘जावो एक बार वह वदन निहार आवो, जोपै कछु पावो लावो मोकौं सुखदाई है’।
कही भली बात सब लोक में कलंक ह्वै है, जानियत याही लिये कीन्हीं मित्रताई है॥५३॥
तिया सुनि कहै ‘कृष्ण रूप क्यों न चाहै? जाय दहै दुख आपही सो’ वचन सुनाये है।
आई सुधि प्यारे की विचारे मति तारे तब, धारे पग मग झूमि द्वारावती आये हैं॥
देखिकै विभूति सुख उपज्यो अभूत कोऊ, चल्यो मुख माधुरी के लोचन तिसाये हैं।
डरपत हियो ड्योढ़ी लाँघि मन गाढ़ो कियो, लियो कर गहि चाह तहाँ पहुँचाये हैं॥५४॥
देखो स्याम आयो मित्र चित्रवत रहे नेकु, हित को चरित्र दौरि रोइ गरे लागे है।
मानो एक तन भयो लयो ऐसे लाइ छाती, नयो यह प्रेम छूटै नाहिं अंग पागे हैं।
आई दुबराई सुधि मिलन छुटाई ताते, आने जल रानी पग धोये भाग जागे है।
सेज पधारइ गुरु चरचा चलाइ, सुखसागर बुड़ाइ आपु अति अनुरागे हैं॥५५॥
चिउड़ा छिपाये काँख पूछैं कहा ल्‍​याये मोकौं?, अति सकुचाये भूमि तकैं दृग भीजे हैं।
खैंचि लई गाँठि मूँठि एक मुख माँझ दई, दूसरी हूँ लेत स्वाद पाइ आपु रीझे हैं॥
गह्यो कर रानी ‘सुखसानी प्यारी वस्तु यहै, पावो बाँटि’ मानो श्रीसुदामा प्रेम धीजे हैं।
श्याम जू विचारि दीनी सम्पति अपार, विदा भये, पै न जानी सार बिछुरनि छीजे है॥५६।
आये निज ग्राम वह अति अभिराम भयो, नयो पुर द्वारका सौं देखि मति गई है।
तिया रँग भीनी संग सतनि सहेली लीनी, कीनी मनुहारि यों प्रतीति उर भई है॥
वैहै हरि ध्यान रूपमाधुरी को पान तासौं, राखैं निज प्रान जाके प्रीति नित नई है।
भोग की न चाह ऐसे तनु निरवाह करैं, ढरैं सोई चाल सुखजाल रसमई हैं॥५७॥
श्रीचन्द्रहासजी
हुतो नृप एक ताके सुत चन्द्रहास भयो, परी यों विपति धाई लाई और पुर है।
राजा कौ दिवान ताके रही घर आन बाल, आपने समान संग खेलै रसढुर है॥