श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश महाभागवत ) (१३
अर्द्धचन्द्र, षट्कोन, मीन, बिन्दु, ऊरधरेखा।
अष्टकोन, त्रैकोन, इन्द्रधनु, पुरुषविशेखा।।
सीतापत्ति पद नित बसत एते मंगलदायका।
चरण-चिह्न रघुवीर के सन्तनि सदा सहायका।। ६।।
सन्तनि सहाय काज धारे नृपराज राम, चरन सरोजन में चिह्न सुखदाइये।
मन ही मतंग मतवारो हाथ आवै नाहिं, ताके लिये 'अंकुश' लै धार्यो हिये ध्याइये।।
शठता सतावै सीत ताही तें 'अम्बर' धर्यो, हर्यो जन सोक ध्यान कीन्हे सुख पाइये।
ऐसे ही कुलिश पाप पर्वत के फोरिवे को, भक्तिनिधि जोरिवे को 'कंज' मन ल्याइये।। १५।।
'जव' हेतु सुनो सदा दाता सिद्धि विद्या ही को, सुमति सुगति सुख सम्पति निवास है।
छिन्नु में सभीत होत कलि की कुचाल लखि 'ध्वजा' सो विशेष जानौ अभै को विसवास है।।
गोपद सो ह्वै हैं भवसागर सो नागर नर जोपै नैन हिय के लगावै, मिटै त्रास है।
कपट कुचाल माया बल सबै जीतिवे को, 'दर' को दरस कर जीत्यो अनायास है।। १६।।
कामहू निसाचर के मारिवे को 'चक्र' धार्यौ, मंगल कल्याण हेतु 'स्वस्तिक' हूँ मानिये।
मंगलीक 'जम्बूफल' फल चारिहूँ को फल कामना अनेक विधिपूर्ण नित ध्यानिये।।
'कलस' सुधा को सर भर्यो हरिभक्ति रस, नैनपुट पान कीजै जीजै मन आनिये।
भक्ति को बढ़ावै औ घटावै तीन तापहूँ को, 'अर्धचन्द्र' धारण ये कारण हूँ जानिये।। १७।।
विषया भुजंग बलमीक तन मांहि बसे, दास को न डसै याते यत्न अनुसर्यो है।
'अष्टकोन' 'षट्कोन' औ 'त्रिकोन' जन्त्र किये जिये जोई जानि जाके ध्यान उर भर्यो है।।
मीन बिन्दु रामचन्द्र कीन्ह्यो वशीकर्ण पायँ ताहि ते निकाय जन मन जात हर्यो है।
सागर संसार ताको पारावार पावै, नाहिं 'उर्ध्वरेखा' दासन को सेतुबन्ध कर्यो है।। १८।।
ध्नु पद मांहि धर्यो हर्यो सोक ध्यानिन को, मानिन को मार्यो मान रावणादि साखिये।
'पुरुष विशेष' पदकमल बसायो राम, हेतु सुनो अभिराम स्याम अभिलाखिये।।
सूधो मन सूधी बैन सूधी करतूति सब ऐसो जन होय मेरो, याही के ज्यों राखिये।
जोपै बुधिवन्त रसवन्त रूप सम्पति में, करिले विचार निसिदिन मुख भाखिये।। १९।।
द्वादश महाभागवत
इनकी कृपा और पुनि समझें द्वादश भक्त प्रधान।।
विधि नारद शंकर सनकादिक कपिलदेव मनुभूप।
नरहरिदास जनक भीषम बलि शुकमुनि धर्मस्वरूप।।