श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें—=मूल-मंगलाचरण=—
—दोहा—
भक्त भक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक।
इनके पद वन्दन किये नाशहिं विघ्न अनेक।।१।।
हरि गुरु दासनि सौं साँचो सोई भक्त सही, गही एक टेक फेरि उर ते न टरी है।
भक्तिरसरूप कौ स्वरूप यहै छवि सार चारु हरिनाम लेत अँसुवन झरी है।।
वही भगवन्त सन्त प्रीति को विचार करै, धरै दूरि ईशता हू पाण्डुन सौं करी है।
गुरु गुरुताई की सचाई लै दिखाई जहाँ गई श्री पैहारी जू की रीति रँग भरी है।।६।।
मंगल आदि विचारि रह, वस्तु न और अनूप।
हरिजन को यश गावते, हरिजन मंगल रूप।।२।।
सन्तन् निर्णय कियो मथि, श्रुति पुराण इतिहास।
भजिवे को दोई सुघर, कै हरि कै हरिदास।।३।।
श्रीगुरु अग्रदेव आज्ञा दई, हरि भक्तन को यश गाव।
भवसागर के तरन कौ, नाहिन और उपाव।।४।।
आज्ञा-निरुपण
मानसी स्वरूप में लगे हैं अग्रदास जबै, करत ब्यार नाभा मधुर सँभार सौं।
चढ़्यो हो जहाज पै जु शिष्य एक, आपदा में कर्यो ध्यान, खिंच्यो मन, छुट्यो रूपसार सौं।।
कहत समर्थ 'गयो वोहित बहुत दूरि, आओ छबि पूरि, फिर ढरौ ताही ढार सौं।'
लोचन उघारिकै निहारि, कह्यो 'बोल्यो कौन?' वही जौन पाल्यो सीथ दै-दै सकुँवार सौं।।
अचरज दयो नयो यहाँ लौं प्रवेश भयो, मन सुख छयो जान्यो सन्तन प्रभाव को।
आज्ञा तब दई यह भई तोपै साधु कृपा, उन्हीं को रूप गुन कहो हिये भाव को।।
बोल्यो कर जोरि याको पावत न ओर छोर, गाऊँ राम कृष्ण नहीं पाऊँ भक्तदाव को।
कही समझाय वोइ हृदय आइ कहैं सब, जिन लै दिखाय दई सागर में नाव को।।११।।