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षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

by महाप्रभु वल्लभाचार्य

DevanagariHindipublished408 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण

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महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य
विरचिताः
षोडशग्रन्थाः

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इस प्रथम स्तबक में
समाविष्ट ग्रन्थ-प्रसूनों की क्रमसूची-
श्रीयमुनाष्टकम्
बालबोधः
सिद्धान्तमुक्तावली
पुष्टि प्रवाह मर्यादा
सिद्धान्त रहस्यम्

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इस चित्र में कोई लिखित पाठ (श्लोक, पदच्छेद, अन्वय, अनुवाद या टीका) उपस्थित नहीं है। यह केवल एक पारंपरिक भारतीय लघुचित्र (लघु चित्रकला / Miniature Painting) है, जिसमें भक्त/ग्रामीण, प्रकृति तथा आवास दृश्य चित्रित हैं।

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थम्
श्रेष्ठ
मुन
बोध
न्त
प्रव
न्त

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श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-विरचित-षोडश-ग्रन्थान्तर्गतं-प्रथमं
श्रीयमुनाष्टकम्

चतसृभिष्टीकाभिः समलंकृतम्

१. श्रीमत्प्रभुचरणानां विवृतिः
२. श्रीहरिरायाणां विवृतिटिप्पणम्
३. श्रीपुरुषोत्तमानां विवृतिविवरणम्
४. श्रीद्वारकेशानां विवृतिटिप्पणम्

श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-प्रवर्तित-शुद्धाद्वैत-सम्प्रदायस्य-
नाथद्वारास्थित-प्रधानपीठाधिष्ठित-गोस्वामितिलकायितश्री
१००८ श्रीगोविन्दलालजी-महाराजश्रीत्येतैः प्रकाशितम्.

वि. सं. २०३६ श्रीवल्लभाब्दाः ५०२

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प्रकाशक :
गोस्वामितिलकायतश्री १००८ श्रीगोविन्दलालजी महाराजश्री,
मोतीमहल, नाथद्वारा, राजस्थान, ३१३३०१, भारत.
साधारण संस्करण २००० प्रति
राज संस्करण १००० प्रति
श्रीवल्लभाब्दः ५०२
ग्रन्थ-परिचय लेखक : गोस्वामी श्याम मनोहर
मुद्रक :
स्टुडियोबहार, २३-ए, सेन्ट्रल चौपाटी बिल्डिंग, चौपाटी,
बंबई-४०० ००७.

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गोस्वामितिलकायितश्री १००८ श्रीगोविन्दलालजी महाराज

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इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है, यह एक रिक्त (blank) पृष्ठ है।

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॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥
॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥
ग्रन्थ--परिचय
सुना जाता है कि अपनी व्रजयात्राके दरम्यान श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु
महावनमें यमुना तटपर गोकुल ग्रामकी खोजमें परिभ्रमण कर रहे थे तब
स्वयम् श्रीयमुनाने प्रकट होकर वर्तमान गोकुलका स्थल दिखलाया था.
प्राचीन गोकुल ग्रामके स्थलकी पहचानके बाद श्रीमहाप्रभु वहां बिराजे और
तब श्रीयमुनाके पुष्टिमार्गीय माहात्म्य या महत्त्व का गान उनके मुखसे
बरवस निकलने लगा. वही षोडशग्रन्थोंमें मंगलाचरणके रूपसे योजित हुआ
श्रीयमुनाष्टकस्तोत्रम् है.
एक किंवदन्तीके अनुसार श्रीयमुनाष्टक वि. सं १५४९ में श्रावण शुक्ल
तृतीयाके दिन श्रीगोकुलमें रचा गया था. १
जैसे श्रीगंगाके साथ दास्यभावात्मिका मर्यादाभक्तिकी एक अन्तर्धारा बहती
है, वैसे ही श्रीयमुनाके साथ पुष्टिभक्तिकी अन्तर्धारा बहती है. श्रीयमुनाके
साथ बहती पुष्टिभक्तिकी यह अन्तर्धारा व्यापिवैकुण्ठके नाथको छोटेसे गोकुलके
नाथ बननेके लिए मार्ग तथा पुष्टिमार्गीय गरिमा प्रदान करती है. क्षयकृत्
कालके प्रवाहमें बहते जीवोंको वहांसे बरबस खींचकर अपने साथ बहाती
हुई यह धारा उन्हें श्रीकृष्णकी दिव्य मधुर नित्यलीलाओंतक पहुंचा देती है.
श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभुने इस यमुनाष्टक स्तोत्रमें श्रीयमुनाके आधि-
भौतिक आध्यात्मिक एवम् आधिदैविक रूपोंका वर्णन करते हुए पुष्टिमार्गीय
दृष्टिकोणसे श्रीयमुनाके असाधारण अष्टविध वैशिष्ट्य अथवा ऐश्वर्य का आठ
श्लोकोंमें वर्णन किया है. क्रमशः एक-एक श्लोक श्रीयमुनाके एक-एक ऐश्वर्यके
वर्णनार्थ कहा गया है. वे ऐश्वर्य श्रीयमुनाके ये हैं :
१) श्रीयमुना पुष्टिमार्गीय अनेकविध सिद्धियोंको देनेवाली हैं. उदाहरण-
तया- साक्षाद्भगवत्सेवोपयोगी देहकी प्राप्ति, भगवान्की विविध पुष्टिलीला-
ओंके दर्शन कर पानेका सामर्थ्य, उन लीलाओंमें अभिव्यक्त होते रसोंको

१. दृष्टव्य श्रीनागरदास बांभणिया द्वारा लिखित- "श्रीषोडशग्रन्थनी रचना तथा श्रीमहा-
प्रभुना चरित साथे संकालायेल महत्व नी तवारीखो" लेख. वैष्णववाणी अंक ४ वर्ष १९७९

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अनुभव कर पानेका सामर्थ्य तथा सर्वात्मभाव आदि. ये सब पुष्टिमार्गीय
सिद्धियां हैं जो श्रीयमुनाद्वारा पुष्टिजीवको प्राप्त होती हैं.
२) श्रीयमुना भगवद्भावको बढ़ानेवाली हैं. देवादिविषयीणी रति या
प्रीति भाव कहलाती है. पुष्टिमार्गके आराध्य देव श्रीकृष्ण ही हैं तथा
श्रीयमुना पुष्टिजीवको इसी कृष्णस्नेहरूप भगवद्भावसे सम्पन्न करती हैं.
३) अपने आराध्य श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध जोडनेमें पुष्टिभक्तके सामने
जो भी प्रतिबन्ध या विघ्न आते हैं उन्हें श्रीयमुना दूर करती हैं. इन विघ्नोंको
हर कर पुष्टिभक्तको भगवदनुभव करने योग्य शुद्ध बना देती हैं. अतः पुष्टि-
जगत्को ये पावन करनेवाली हैं.
४) जैसे गुणधर्म और रूप भगवान्ने पुष्टिलीलामें प्रकट किये हैं वे सभी
श्रीयमुनामें भी प्रकट किये हैं. अतः श्रीयमुनासे जिसका सम्बन्ध स्थापित
हुआ हो उसका परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके साथ भी सम्बन्ध
अनायास ही स्थापित हो गया समझ लेना चाहिये.
५) भगवान्के प्रिय भक्तोंमें जो भी कलिरूप दोष हों उन्हें श्रीयमुना
दूर कर देती हैं.
६) रासलीलामें भगवान्के तिरोहित हो जानेपर जैसे गोपिकाओने
श्रीयमुनातटपर निःसाधनताके भावसे श्रीकृष्णकी प्रतीक्षा की, वैसे ही जो भी
पुष्टिजीव श्रीयमुनाके आश्रयसे भगवान्को खोजना चाहता है वह भगवान्का
प्रेमपात्र बनता है तथा भगवान्को पा सकता है. यमुना-जल-पानका यह असा-
धारण महत्त्व है कि पानकर्ताके देह-इन्द्रिय-आदि कालप्रवाहमें उसकी
आत्माको बहाकर कभी यमालयतक नहीं पहुंचाते. किन्तु कालातीत परमा-
त्माको प्रणयरशनामें बांधकर पानकर्ता भक्ततक अवश्य पहुंचा देते हैं.
७) देह इन्द्रिय प्राण अन्तःकरण एवम् आत्मा यों सभीके द्वारा भगवत्-
लीला एवम् भगवत्स्वरूप की अनुभूति-इस अलौकिक सामर्थ्यको तनुनवत्व
अर्थात् तनु-देहका नवीनीकरण माना गया है. श्रीयमुना पुष्टिजीवोंके देहादि-
में ऐसा अलौकिक सामर्थ्य प्रकट कर देती हैं कि सहस्रों परिवत्सरसे अपने
प्रभुसे बिछुड़ा हुआ जीव अपने कालजर्जरित देहेन्द्रियादिमें एक ऐसी विलक्षण
शक्ति या नूतनताका अनुभव करने लग जाता है कि उसे भगवान्की रसा-

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त्मिका अनुभूति सभी तरहसे होने लग जाती है. न केवल इतना अपितु
नित्यलीलामें भी उसे नूतन देह मिल जाती है, श्रीयमुनाके कारण.
८) श्रीयमुनाके तटपर तथा जलमें भी श्रीकृष्णकी अनेकविध लीलायें
आधिदैविक रूपमें सनातन चलती रहती हैं. श्रीयमुनामें जलक्रीडानिरत परमा-
नन्दात्मक प्रभुका आनन्द ही श्रमजलकणोंके रूपमें उच्छलित हो कर
श्रीयमुनाजलमें तादात्म्य प्राप्त कर लेता है. अतः श्रीयमुनाजलस्नान पुष्टि-
भक्तोंमें श्रीकृष्णके साथ अंगसंगकी अनुभूतिकी सिहरन पैदा करता है.
श्रीयमुनाका यह आधिदैविक स्वरूप समग्रतया लीलासामयिक पुष्टि
भक्तोंकी अनुभूतिका ही विषय होता है. आंशिक रूपमें परन्तु आधुनिक
पुष्टिजीवोंके लिए भी प्रतिबन्धकारी दोषोंका निवारण, स्वभावविजय,
भगवद्भक्ति तथा भगवत्प्रेमभाजनता श्रीयमुनाके द्वारा सम्पादित होती हैं. अतः
श्रीयमुनाकी कृपासे पुष्टिजीव पुष्टिमार्गमें प्रवेशयोग्य बनता है यह मंगल-
विधान श्रीयमुनाका कार्य है, अतः इनकी स्तुतिको पुष्टिमार्गीय उपदेशमें
मंगलाचरणके रूपमें योजित किया गया है.
प्रस्तुत संस्करण वि. सं. १९८५ में प्रकाशित हुए संस्करणका ऑफसेट
द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. श्रीमद्गोस्वामिकुलभूषण-विद्यानिधि-श्रीव्रजरतनलालजी
महाराजकी श्रीबालकृष्ण शुद्धाद्वैत महासभा (सूरत) द्वारा यह प्रकाशित
हुआ था तथा इसके सम्पादक थे श्रीचीमनलाल ह. शास्त्रीजी. श्रीयमुनाष्ट-
कम्के पुनःप्रकाशनके अवसरपर इन दोनों महानुभावोंके प्रति हम हार्दिक
कृतज्ञताज्ञापन प्रकट करते हैं. इति शम्.

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श्रीकृष्णः।
प्रास्ताविकम् ।
श्रीमद्गोस्वामिकुलकौस्तुभविद्वद्रत्नश्रीव्रजरत्नलालजीमहाराजचरणसंस्थापितायाः श्रीबाल-
कृष्णशुद्धाद्वैतमहासदसो मुद्रणकार्ये प्रचलति, यस्मिन् षोडशग्रन्थानां मध्येऽस्माभिर्विवेकधैर्याश्र-
यान्तःकरणप्रबोधबालबोधान्तास्त्रयो ग्रन्थाः प्रकाशिताश्चतुर्थं चरममिदमिदानीं श्रीयमुनाष्टकं
सटीकं प्रदाय षोडशग्रन्थान् सम्पूर्णीकुर्वतां प्रमोन्दन्ते नश्चेतांसि । सुविदितमेतद्यत् षोडशग्रन्थानां
यावल्लभ्यटीकासमेतं मुद्रणकार्यमन्तिमग्रन्थसेवाफलत एवारब्धं सम्प्रदायविद्भिरिस्तेलीवालामहा-
शयैः, तदिदं प्रथमे श्रीयमुनाष्टके एव विश्रान्तिमर्हति । भगवदिच्छापि तथैवासीत् । येन सर्वेभ्यः
प्रागेवास्य मुद्रणे समारब्धेपि गो. श्रीद्वारकेशचरणटीकाया अनुपलब्धिवशात् महान् विलम्बो-
भूत् । तां टीकामन्वेष्टुमस्माभिर्बहुयतितम् । सर्वसाहाय्यवितरणपरायणैः श्रीव्रजरत्नलालचरणैरपि
कोटा-काशी-नाथद्वारा-मोहमयीस्थानि पुस्तकालयानि गवेषितानि, तदानीं काशीसङ्ग्रहात् पत्रद्व-
यमेवासादितमस्याः । तदपि पुष्टिकल्पतरुत्रैमासिके प्रकाशितम् । अहं तु भगवदिच्छायाः प्राब-
ल्यमवधार्य तत्परायणः सन् चातकव्रतमवलम्ब्य उपाविशम् । अन्तरा षोडशग्रन्थानां साररूपः
सङ्गत्यात्मकश्चैको विस्तीर्णलेखो यमुनाष्टकारम्भे देय इति आवरणभङ्गषोडशग्रन्थटीकादेर्मया
उद्धृत्य सज्जीकृतः । परं यमुनाष्टकस्य महर्घं स्यादिति भयेन तदभिनिवेशं परित्यज्य तं
स्वतन्त्रतयान्यत्र दास्याम इत्येवावधारितम् । एकदाकेन विदुषा श्रीयमुनाष्टकस्य प्राकट्ये को
विलम्ब ? इति पृष्टोऽहं टीकानुपलब्धेरेव कारणत्वेनावोचम् । 'स्वपार्श्वे विराजते टीकेयम्'इत्य-
भिधाय स श्रीद्वारकेशचरणप्रणीतां स्वहस्ताक्षरैर्लिखितां शुद्धां टीकामंददाद् इति, मया तु
बहुधन्यवादाः प्रदत्ताः । श्रीयमुनाष्टकस्य मूलव्याख्यानं षष्ठश्लोकपर्यन्तं श्रीप्रभुचरणानामग्रे
तदाज्ञाप्तश्रीगोकुलनाथचरणैर्विलिख्य श्रीपितृचरणेभ्यो निवेदितमिति प्राचीना आहुः । तस्य
त्रीणि विवरणानि, श्रीहरिरायचरणानां श्रीपुरुषोत्तमचरणानां श्रीद्वारकेशचरणानां विवृतिटि-
प्पणं विवृतिविवरणं टीकाटिप्पणमिति क्रमशोत्र प्रकाशितानि । टीकाकृतां मध्ये श्रीहरिराय-
श्रीपुरुषोत्तमचरणानां चरितं बहुधा गीतं सम्प्रदायज्ञैरिति नात्र तत्पुनरुक्तिं समीहे । परं क एते
श्रीद्वारकेशचरणाः प्राचीना वार्वाचीना इति शङ्कते लोकः, गो० श्रीमधुरानाथानां सूनवः श्रीद्वार-
केशचरणाः सं० १८४३तमेऽब्दे प्रादुर्भूताः । स्वीयां गङ्गामातरपि ग्रन्थारम्भे प्रणमन्ति, एवं
“द्वारकेशं गिरिवरं मथुरानाथसञ्ज्ञकम्” इति स्वपितृचरणान् स्मरन्ति च । तत्र श्रीद्वारकेश-
चरणाः १७७४तमेऽब्दे श्रीगिरिधरचरणाः १८०३तमेऽब्दे श्रीमथुरानाथाः सं० १८२९-
तमेऽब्दे प्रादुर्भूताः । तैश्चतुःश्लोकीसिद्धान्तमुक्तावलीग्रन्थानां विहिता विवृतयः । श्रीयमुना-
ष्टकारम्भे षोडशग्रन्थानां सङ्गतिं कुर्वद्भिस्तैः सर्वेषामेव विवरणं कर्तुं प्रतिज्ञातम् । अत एवान्यपि
विवरणानि स्युरपि, परं न प्रसिद्धानि । बालबोधविवरणस्य प्रणेतारो गो० श्रीद्वारकेशचरणास्तु
प्राचीनाः सुप्रसिद्धा एव ।
अस्य श्रीयमुनाष्टकस्य गुर्जरानुवादः 'सूरत सीटी' मुद्रणालये सम्मुद्रितः । तस्य पुष्टिक-
ल्पतरुवाचकेभ्यो वितरणं कृतम्। पुनः प्रतापमुद्रणालये सम्मुद्रितोनुवादः, पृथग् ग्रन्थरूपो यः शु०
महासदसः कार्यालयेतो मूल्येनोपलभ्यते । एवं ग्रन्थान्वेषणादिविहायाससाध्यं कार्यं श्रीमदाचार्य-
चरणकृपयैव सुनिष्पन्नमिति एतेषां चरणकमलेषु विनिवेद्यते । अस्य मुद्रणव्ययस्तु अधिकः सञ्जातः,
परं सार्धशतमेव नगरठट्ठावासिना श्रेष्ठिना प्रदत्तम् इति मुखपृष्ठोपरि अभिधानं निवेशितं तस्य ।
श्रावणशुक्लैकादशी सं० १९८५ }
भवदीयः
चीमनशास्त्री.

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श्रीकृष्णाय नमः ।
श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः ।
श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।
श्रीमद्भगवद्वदनावतारश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणप्रणीतं
श्रीयमुनाष्टकम् ।
मूलम्—नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा
मुरारिपदपङ्कजस्फुरदमन्दरेणूत्कटाम् ।
तटस्थनवकाननप्रकटमोदपुष्पाम्बुना
सुरासुरसुपूजितस्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम् ॥ १ ॥
कलिन्दगिरिमस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला
विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्डशैलोन्नता ।
सघोषगतिदन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा
मुकुन्दरतिवर्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता ॥ २ ॥
भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः
प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः ।
तरङ्गभुजकङ्कणप्रकटमुक्तिकवालुका-
नितम्बतटसुन्दरीं नमत कृष्णतुर्यप्रियाम् ॥ ३ ॥
अनन्तगुणभूषिते शिवविरञ्चिदेवस्तुते
घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे ।
विशुद्धमथुरातटे सकलगोपगोपीवृते
कृपाजलधिसंश्रिते मम मनस्सुखं भावय ॥ ४ ॥
यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियमभावुका
समागमनतो भवत्सकलसिद्धिदा सेवताम् ।

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तया सदृशतामियात्कमलजा सपत्नीव य-
द्धरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम् ॥ ५ ॥
नमोऽस्तु यमुने सदा तव चरित्रमत्यद्भुतं
न जातु यमयातना भवति ते पयःपानतः ।
यमोऽपि भगिनीसुतान्कथमु हन्ति दुष्टानपि
प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ॥ ६ ॥
ममाऽस्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता
न दुर्लभतमां गतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये ।
अतोऽस्तु तव लालना सुरधुनी परं सङ्गमात्
तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितेः ॥७॥
स्तुतिं तव करोति कः कमलजासपत्निप्रिये
हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः ।
इयं तव कथाऽधिका सकलगोपिकासङ्गम-
स्मरश्रमजलाणुभिः सकलगात्रजैः सङ्गमः ॥ ८ ॥
तवाऽष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा-
समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।
तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति
स्वभावविजयो भवेद्वदति वल्लभः श्रीहरेः ॥ ९ ॥
श्रीमद्वैश्वानरावतारश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणविरचितं
श्रीयमुनाष्टकस्तोत्रं
सम्पूर्णम् ।

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श्रीकृष्णाय नमः ।
श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः ।
श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।
श्रीमद्ग...दूनावतारश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणप्रणीतं
श्रीयमुनाष्टकम् ।
श्रीमत्प्रभुचरणविनिर्मितया विवृत्या,
श्रीहरिरायचरणप्रणीतेन टिप्पणेन, श्रीपुरुषोत्तमचरणप्रणीतया
श्रीप्रभुचरणविवृतिविवृत्या च समनुगतम् ।
मूलम्—नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा
श्रीमत्प्रभुचरणविनिर्मिता विवृत्तिः ।
विश्वोद्धारार्थमेवाऽऽविर्भूतवृन्दावनप्रिया ।
कृपयन्तु सदा तातचरणा मयि विठ्ठले ।॥
श्रीहरिरायप्रणीतं श्रीप्रभुचरणविवृतिटिप्पणम् ।
श्रीकृष्णाय नमः । अथ श्रीमत्प्रभुचरणाः श्रीयमुनाष्टकविवृतिं विरचयन्तः
प्रथमाचार्यवर्यस्वरूपमेतत्सजातीयधर्मवत्त्वेन निरूपयन्तः स्वास्मिंस्तत्कृतिकृतिशक्ति-
सिद्धये तत्कृपां प्रार्थयन्ति विश्वोद्धारार्थमिति । प्राक्तव्यप्रयोजनकम् । अत्र
विश्वपदं सर्ववाचकम् । तदपि सङ्कुचितवृत्ति । "सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्याः" इतिवत् ।
श्रीपुरुषोत्तमप्रणीता श्रीप्रभुचरणविवृतिविवृतिः ।
श्रीमद्वल्लभनन्दन दासेऽस्मिन् कृपय साधनैः शून्ये ।
श्रीयमुनाष्टकविवृतिं विवरीतुं काङ्क्षते यतः करुणां ॥ १ ॥
अथ श्रीमत्प्रभुचरणाः श्रीमदाचार्याणां स्वस्य चाऽवतारप्रयोजनं तत्र श्रीयमुनाया
निर्वाहकत्वादष्टककरणं चाऽनुसन्धाय श्रीयमुनाष्टकविवृतिं विरचयिषव-
स्तत्साफल्याय श्रीमदाचार्यान् प्रार्थयन्ति विश्वोद्धारार्थमिति । विश्वोद्धारार्थं

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२ श्रीयमुनाष्टकम् ।
श्रीहरिरायप्रणीतं टिप्पणम् ।
तथा च, पुष्टिमार्गाङ्गीकृतानामेव जीवानामत्रोद्धार इति ज्ञेयम् । अयं च पुष्टिप्रभोः
श्रीयमुनायाः श्रीमदाचार्यचरणानां च समानो धर्मः । भगवता व्रजस्थानां श्रीयमु-
नया अपि प्रभुसम्बन्धसम्पादनेन प्रभुप्राकट्यकरणेन च तासामेवाऽस्मत्स्वामिभि-
रपि तथाविधानामिदानीन्तनानामुद्धारात् । विशेषस्त्वेतावानेव । भगवता श्रीयमु-
नया च लीलास्सृष्टिस्थानामेव तथाकरणम् । इदानीन्तनानां प्रभुपारोक्ष्येऽस्मत्प्रभु-
भिरिति । एवं च सति त्रयाणां सजातीयधर्मवत्त्वे च सिद्धम् ।
भगवान् विरहं दत्वा भाववृद्धिं करोति हि ।
तथैव यमुना स्वामिस्मरणात्स्वीयदर्शनात् ॥ १ ॥
अस्मदाचार्यवर्यास्तु ब्रह्मसम्बन्धकारणात् ।
तापक्लेशप्रदानेन निजानां भाववर्द्धकाः ॥ २ ॥
उद्धारोऽत्र भगवदासक्तिसम्पादनेन प्रपञ्चात्पृथक्करणम् । तेन सर्वात्मभावदानमेव
स इति बोध्यम् । एवकारोऽत्र प्रयोजनान्तराभावाय । एतेन मायावादखण्डनब्रह्मवा-
दस्थापनकर्ममार्गप्रवर्त्तनादिकमानुषङ्गिकमिति सूचितम् । स्वरूपमाहुः—आविर्भू-
तेति । आविर्भूतो व्रजजनहृदयेभ्यो लीलाकरणार्थं यो वृन्दावनप्रियः सदानन्दस्त-
द्रूपास्त इत्यर्थः । यथा भगवान् लीलाप्राकट्यायैव रसात्माऽऽविर्भूतस्तथैतेऽपि श्रीभाग-
वतविवृतिप्रकटीकरणेन तत्प्राकट्यार्थमेवाऽऽविर्भूता इति भावः । अथवा, वृन्दावनमेव
प्रियं यासाम्, भगवद्विरहे तदर्थमपि तदपरित्यागात् । ताः स्वामिन्यः । आविर्भूताश्च
तास्तथाभूताः, ता एवैत इत्यर्थः । स्वामिनीभावेन प्राकट्यदशायां सेवादिकरणा-
श्रीपुरुषोत्तमप्रणीता विवृत्तिः।
सदैव, सदैव तदर्थं वा, सदा तदर्थमेव वा, कृपयन्विति सम्बन्धः । एतेन स्वस्य
तदुद्योगस्तदावश्यकत्वं कृपालुत्वं च बोधितम् । तथाच कृपयाऽष्टकविवृतिभ्यां तं
कुर्वन्तु कारयन्तु चेति भावः । श्रीमदाचार्यावतारप्रयोजनं तु—'अर्थ तस्ये'ति
श्लोकेन 'सर्वोद्धारप्रयत्नात्मे'त्यादिसन्दर्भेण च स्वयमेव ज्ञापितम् । तदत्र 'विश्वोद्धारा-
र्थमेवाऽऽविर्भूते'ति पदसमभिव्याहारेण बोधितम् । स्वावतारप्रयोजनं तु स्वनाम्ना,
विदा ज्ञानेन ठाः शून्यास्तान् लात्यनुगृह्णातीति तदर्थात् । पदनिरुक्तिस्तु—विदा
इत्यत्र विभक्तिलोपे चर्त्वे ष्टुत्वे च कृते 'चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरि'ति वार्त्ति-
कात्ष्टस्य ठत्वम् । 'पौष्करसादेर्मते शर्येव अन्येषां मते त्वन्यत्राऽपी'ति कृष्णपण्डितै-
र्विस्तरेण व्याख्यानात् । यदि च नवीनमतमालम्ब्येदं नाऽऽद्रियेत तदा तु—
१ भगवदास्यरूपस्य आचार्यरूपेण इति विशेषः । अ.

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श्रीहरिरायश्रीपुरुषोत्तमचरणानां टिप्पणविवृतिभ्यां संवलितम्। ३
श्रीहरिरायप्रणीतं टिप्पणम् ।
तद्भावभावनेन च तद्रूपत्वमिति भावः । वस्तुतो भावात्मा भगवान्, 'रसो वै सः' इति
श्रुतेः। तदास्रूपत्वादेतेऽपि तथा। तथा श्रीममुनाऽपि द्रवीभूतरसात्मकतत्स्वरूपत्वेन ।
तत्र यथा भगवतीव श्रीममुनायामपि स्वामिनीभावेन स्त्रीरूपत्वं, तेन च तत्र सर्वाऽपि
भगवल्लीला, भगवद्भावेन च भगवत्त्वं, विरहे भगवत्स्वरूपतद्दर्शनेन स्वामिनीसुखाय,
तथाऽत्राऽपि प्राकट्यदशायां स्वामिनीभावेन सेवादिकृतौ तद्रूपत्वं, भगवद्भावेन भग-
वद्रूपत्वं, विरहे तासामन्तरास्थ्यप्राकट्येन स्वरूपसम्बन्धिसुखदानायेति बोध्यम्। अत
एवोक्तं श्रीवल्लभाष्टके—” यत्सादानन्ददं श्रीव्रजजननिचय' इति । यद्वा । आवि-
र्भूतं स्वस्वहृदयेभ्यो बहिःप्रकटीभूतं यद्वृन्दावनं तत्प्रियं यासाम् । अन्तःस्थितावपि
बहिःप्राकट्यस्यैवाऽभिलषितत्वात् । अत एव 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्'
(१०-२१-१०) इति ताभिर्गीतं।तथाच तादृक्तद्रूपत्वादस्मत्प्रभवोऽपि लीलाविष्करणा-
भिलाषिण इति ज्ञेयम् । तातचरणा इति सम्बन्धिनिरूपणं तु पुष्टिमार्गीयाचार्य-
करुणासिद्धिर्यथाकथञ्चित्सम्बन्धसिद्ध्यैव भवति न त्वन्यसाधनैरिति बोधनाय ।
देहेन भावतो वाऽपि सम्बन्धः फलसाधकः ।
पुष्टिमार्गे नाऽतिरिक्तं साधनं साधकं ततः ॥ १ ॥
नायमात्मेत्युपनिषन्निषेधति यतोऽखिलम् ।
नन्दादयो देहजेन प्रादुर्भावेन गोपिकाः ॥ २ ॥
मयीति तत्कृपायोग्यत्वबोधनाय । सर्वसाधनराहित्येन केवलं तदीयत्वाद्
अत एवैकवचनम्, अत एव सप्तश्लोक्यां 'तनोतु निजदासस्य सौभाग्यम्'इति
श्रीपुरुषोत्तम प्रणीता विवृतिः।
'पररूपं तकारो लचटवर्गेषु'—तकारः पदान्तो लचटवर्गेषु परे पररूपमापद्यते—
इति कौमारसूत्रात् । आवश्यकत्वमपि विवृतेरेतेनैव ध्वनितम् । आविर्भूतवृन्दा-
वनप्रिया इति । अत्र वृन्दावनस्य प्रियः, वृन्दावनं प्रियं यस्येति वा वृन्दावनप्रियः,
आविर्भूतश्चाऽसौ स च आविर्भूतवृन्दावनप्रिय इति तत्पुरुषबहुव्रीह्यन्यतरगर्भः कर्म-
धारयः । तथाच तदभिन्ना इत्यर्थः । अत्र भगवत्पक्षे अभेदो वास्तवः । 'वस्तुतः
कृष्ण एवे'त्याद्युक्तेः । व्रजभक्तपक्षे तद्भाववत्त्वकृतसारूप्यनिबन्धनः । 'तत्सार-
भूते'ति नामनिर्देशात् । तातचरणा इत्यत्र चरणपदं बहुवचनं च पूजार्थम् ।
'जीवत्सु तातपादेषु', 'मुद्रे ब्रूहि सलक्ष्मणाः कुशलिनः श्रीरामपादा' इत्यादि-
प्रयोगदर्शनात्, 'एकत्वं न प्रयुञ्जीत गुरावात्मनि चेश्वरे' इति वाक्याच्च 'जात्या-


१ तासामन्तरा स्वप्राकट्येनेति ग. २ तादृग्रूपत्वादिति ग.घ. ३ तन्मयत्वादिति ग-घ.

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४ श्रीयमुनाष्टकम्।
विविधलीलोपयोगिनीं कालिन्दीं स्तोतुकामाः श्रीगोकुलेशे यथा जीवै-
र्नमनातिरिक्तं न कर्तुं शक्यं, तथा कालिन्द्यामपीत्याशयेनाऽऽदौ नमनमे-
श्रीहरिरायप्रणीतं टिप्पणम् ।
प्रार्थना । विट्ठल इति नामग्रहणं नाम्नाऽपि तद्योग्यताद्योतनाय । ज्ञानशून्यानु-
ग्राहकत्वं हि नामार्थः । तस्य चाऽऽचार्यकरुणामन्तरेणासिद्धेस्तत्कृपयैव सामर्थ्य-
रूपया तादृशजनानुग्राहकत्वसिद्धिः । तदर्थमाचार्यचरणानामेव प्रभुणाऽऽविर्भावित-
त्वात् । अस्मिन्मार्गे कृपैव साधनं फलं चेति बोधनाय कृपयन्वित्यभिहितम् ।
इदं साधनफलरूपत्वञ्च 'कृपयायुक्तस्य तु यथा सिद्धयेदि'ति 'कृपानन्दः सुदुर्लभ'
इति निबन्धतिरोधलक्षणग्रन्थीयवाक्याभ्यामवमन्तव्यम् । एवमेकेन पद्येन प्रभुभिः
स्वाभीष्टप्रार्थनाप्रसङ्गेन निजाचार्यस्वरूपं निरूपितम् ।
विविधलीलोपयोगिनीमिति । आचार्यचरणानां हि प्रभुलीलासम्बन्धो-
ऽभिलषितः । अत एवाऽग्रे तनुनवत्वप्रार्थनम् । स च तादृक्तत्सम्बन्धिपरितोषणेन
भवति । तच्च यथास्थितरूपनिरूपणेन स्तुत्येति श्रीयमुनाया लीलासम्बन्धित्वबोध-
नाय विविधलीलोपयोगिनीमित्युक्तम् । विविधाः स्वरूपगुणभेदेन सर्वात्मभाव-
कामभावादिभेदेन^१ शास्त्रीयाशास्त्रीयप्रकाराभ्यां नानाप्रकारा या भगवतः स्वामि-
नीभिः सह लीलास्तासु अलौकिकशरीरसम्पादकत्वेन प्रभुसम्बन्धसम्पादनेन भा-
वजनकत्वादिश्चि^२ तथेत्यर्थः । कालिन्दीमिति । यद्यपि यमुनामिति वाच्यं
तद्भिन्नत्वादस्याः, तथापि कालिन्दीमूलरूपत्वं तस्यां बोधयितुं भगवति 'देव-
कीजठरभूरि'तिवाक्यात् 'देवकीसुतपदाम्बुजे'तिवाक्याच्च देवकीसुतत्वोक्ति-
वदत्राऽपि कालिन्दीत्वोक्तिरितिबोध्यम् । किञ्च । प्रभुसम्बन्धप्रतिबन्धकदोषनि-
श्रीपुरुषोत्तमप्रणीता विवृतिः।
ख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्यामि'ति सूत्रे 'जात्याख्यायामि'ति योगं विभज्य
पूजायामेकत्वे बहुवचनं प्रयुक्तमित्यदोषः । एवं कृपाप्रार्थनयाऽऽर्थिकनमनात्मकं
मङ्गलं विधाय विवक्षितोद्धारस्य भजनानन्दावाप्तिरूपत्वात्तत्र च भक्तिमत्कृतस्य
दैन्यस्यैव साधनत्वात्तद्धृदि कृत्वा भक्तिस्तत्प्रतिबन्धकनिवृत्तिः तत्तदुपयोगिपरिकर-
सम्पत्तिश्चाऽर्थज्ञानपूर्वकाष्टकपाठेन भविष्यतीति ज्ञापनाय स्तोतव्यायाः श्रीकालिन्द्याः
स्वरूपमुपकारकत्वं कृपावत्त्वं च बोधयन्त एवाऽऽद्यश्लोकमवतारयन्ति विविधे-
त्यादि । अत्र विविधलीलोपयोगिनीमित्यनेन हेतुगर्भेण विशेषणेन स्तुतिप्रयोजकं
१ भेदेन चेति ख. २ अश्चामिति ख.

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श्रीहरिरायश्रीपुरुषोत्तमचरणानां टिप्पणविवृतिभ्यां संवलितम् । ५
वाऽऽहुर्नमामीति । भगवताऽष्टविधैश्वर्यं कालिन्द्यै दत्तमिति ज्ञाप-
श्रीहरिरायप्रणीतं टिप्पणम् ।
वृत्तये वा तथोक्तिः । कलिं दोषं द्यति खण्डयतीति कलिन्दस्तस्याऽपत्यमिति
तादृग्धर्मवत्त्वेन भक्तप्रतिबन्धनिवर्त्तकत्वात् । अत एवाऽग्रे 'हरिप्रियकलिन्दये'त्यत्र
तथैव व्याख्यातं प्रभुभिः । अनेन कालिन्दीपदस्याऽस्यां न धर्मवाचकत्वेन नामत्वं
किन्तु धर्मविशिष्टतद्वाचकत्वेन विशेषणत्वमिति सूचितम् । स्तोतुकामा इति काम
एव पूर्वं निरूपितः। अग्रे तु स्वरूपमाहात्म्यस्फूर्त्या स्तुतिकरणमशक्यमिति 'स्तुतिं
तव करोति कः' इत्यनेन निरूपणीयमिति भावः । श्रीगोकुलेश इति । पुष्टिमा-
र्गीयो लोकवेदाप्रसिद्धः पुरुषोत्तम एतत्पदेनोक्तः । तत्र लीलासृष्टिप्रवेशमन्तरा गम-
नाभावेन साक्षात्कारासम्भवात्परोक्षास्थितैर्नमनमेव स्वदैन्याविष्कृतये कार्यं यथा,
तथा लीलासृष्टिप्रवेशमन्तराऽत्राऽपीति भावः । अत एवाऽऽचार्यवर्यैः-'नमो नमस्ते-
ऽस्त्वृषभाय सात्वताम्'ति द्वितीयस्कन्धीयपद्यविवृतौ 'गमनाभावान्नमनाधिकार'
इत्यभिहितम् । आदाविति । अग्रे तु 'मम मनः सुखं भावय' 'ममाऽस्तु तव सन्निधौ
तनुनवत्वमि'त्यादि प्रार्थनीयमिति भावः। नमनमेवेत्येवकारः पूर्वमग्रिमप्रार्थनीयास्फू-
र्त्या तदतिरिक्तव्यवच्छेदार्थः । अष्टविधैश्वर्यमिति । भगवता दत्तमिति । अत्राऽयं
भावः। भगवान् हि लोके स्वस्य रसात्मकं रूपं तादृशीं लीलां च प्रकटयितुं प्रादुर्भूय
सर्वात्मभाववतीषु तथा लीलां चकार। तत्र तदधीनत्वमङ्गीकृत्य सर्वाऽपि कृतिस्तद-
तिरिक्तास्फूर्तिश्च । अन्यथा रसात्मकत्वं न स्यात् । एवं सति सर्वमेतदैश्वर्यविरोधीति
लीलासृष्टौ तत्कार्यार्थं लीलोपयोगिन्यां स्वामिनीभगवत्सम्बन्धिन्यां श्रीयमुनायां
तत्स्थापितवानिति भगवता दत्तमित्युक्तम् । स्वयं तु रसात्मकत्वेन तदधीनस्तदतिरि-
श्रीपुरुषोत्तमप्रणीता विवृतिः ।
रूपमुक्तम् । अनेन स्तोत्रेण स्तुत्या प्रसन्ना स्तोतॄणां लीलासम्बन्धं कारयिष्यतीति
च ध्वनितम् । श्रीगोकुलेशपदेन 'अन्व्हापृतं निशि शयानम्'ति वाक्योक्तं
निःसाधनफलात्मकं 'तस्मान्मच्छरणं गोष्ठम्'त्याद्युक्तं दीनबन्धुत्वं च बोधितम् ।
न कर्तुं शक्यमित्यनेन साधनान्तराणां फलानुपधायकत्वम् । अतिदेशेन तद्धर्मव-
त्त्वम् । नमनपदेन कायादित्रयव्यापारात्मकमात्रं नमनं सङ्गृह्यतेऽतो न चोद्यावसरः ।
आदौ नमनोक्तेरयमेवाऽऽशय इत्यत्र गमकमाहुः-भगवतेत्यादि । अन्यथा श्लोकस-
१ धर्मवाचकत्वेनेति ख-ङ. २ पूर्वनिरूपित इति ग-घ. ३ स्तुतिकरणमप्यशक्यमिति क-ख-घ-ङ.
४ परोक्षस्थितैर्जीवैरिति च. ५ भा. स्कं. २-४-१४.

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६ श्रीयमुनाष्टकम् ।
मुरारिपदपङ्कजस्फुरदमन्दरेणूत्कटाम् ।
नायाष्टभिः श्लोकैः स्तुवन्ति । साक्षाद्भगवत्सेवोपयोगिदेहा सितलीला-
श्रीहरिरायप्रणीतं टिप्पणम् ।
क्तस्फूर्तिरहितश्चेति। तच्चैश्वर्यमष्टविधं पुष्टिमार्गीयम् । तथाहि। (१) सकलसिद्धिहेतुत्वं,
(२) भगवद्भाववर्द्धकत्वं, (३) भगवत्सम्बन्धप्रतिबन्धनिरारकरणेन तदनुभवयोग्य-
ताहेतुशुद्धिसम्पादकत्वरूपं भुवनपावनीत्वं, (४) भगवत्समानधर्मवत्त्वादनायासेन
तत्सम्बन्धसम्पादकत्वं, (५) भगवत्प्रियकलिनिवारकत्वं, (६) भगवदीयोत्कर्षाधा-
यकत्वं, (७) भगवत्प्रियत्वसम्पादकत्वं (८) तनुमवत्वसाधकत्वं चेति । इदं च
लीलासृष्टिस्थेष्वेव ज्ञेयम् । तत्रैव तदधिकारात् । आधुनिकानां तु तदर्थप्रकटिततदा-
स्वरूपादेव सर्वमिति विमर्शः २ । सिद्धिरूपं विवृण्वन्तीतरावैलक्षण्याय सिद्धान्तर-
भ्रमन्निवारणाय चै—साक्षादित्यादिना । स्वरूपादिषु परम्परासेवने तु नाऽलौ-
किकं देहमपेक्ष्यते । किन्तु निवेदनाख्यसंस्कारसंस्कृतं लौकिकमेव । तत्र भगवतो-
ऽपि सावरणत्वेन जीवस्य साक्षात्स्पर्शाभावात् । लीलाप्रवेशे तु साक्षात्स्पर्शाय तद-
पेक्षेति साक्षात्पदमुक्तम् । लीलावलोकनमाप सिद्धिश्चैव । यथा योगधर्मेण योगि-
नामतीन्द्रियपदार्थदर्शनसिद्धिरस्तथा श्रीमयुनासेवनधर्मेणाऽपि गुणातीतप्रमुलीलादर्श-
नसिद्धिरिति भावः। तथा तद्रसानुभवश्च लीलोपयोग्यिन्योभयसम्बन्धिन्या मध्यस्थयैव
भवतीति तदनुभवरूपा सिद्धिरप्येतत्सेवनेन भवतीत्यर्थः। सर्वात्मभावसिद्धिरपि भगव-
त्स्वरूपत्वाद् भगवतेव तद्धृदयग्रहणेन वशीकरणाद्भवतीति तत्सेवनाधीनैवेत्यर्थः ।
श्रीपुरुषोत्तमप्रणीता विवृतिः ।
ङ्ख्याऽत्र भगवत्साम्यं न बोधयेयुरतस्तथेत्यर्थः । सङ्ख्यायाः प्रयोजनवत्त्वं जातेष्ट्य-
धिकरणे सिद्धम् । ऐश्वर्यदाने गमकमाद्यविशेषणमेवेत्याशयेनाऽऽध्यात्मिकाधिभौतिक-
व्यवच्छेदाय च तदैश्वर्यदेयं विवृण्वन्ति साक्षादित्यादि । अत्र च यदीश्वरा न
स्यादुक्तसिद्धिर्निमित्तभूता न स्यादिति कार्यलिङ्गकानुमानगर्भेण तर्केण तत्सत्ता
साधिता । सिद्धिविवरणेन चैश्वर्यमत्र नैकादशस्कन्धोक्ताणिमादिरूपं विवक्षितम् ,
किन्त्वेतत्स्तोत्रोक्तं भक्तिमार्गीयसामर्थ्यविशेषरूपम् । अणिमादिमतामपि सनका-
दीनामुक्तसिद्धिदानादर्शनेन तत्र तदभावनिश्चयात् । तदप्यैश्वर्यं विवृतं श्रीहरि-
रायैः । तथाहि उक्तसकलसिद्धिहेतुत्वमेकम् । भगवद्रतिवर्द्धकत्वं द्वितीयम् ।
१ सर्वत्र मूर्धन्यान्त एव पाठ उपलब्धः ष श्ति स एव पूर्वं स्वीकृतः अस्माभिस्तु श इति लभ्यते । भ.
२ सिद्धान्तन्तरेति ग-घ. ३ निराकरणाद्येति ङ. ४ चेति नास्ति. ङ.