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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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तृतीय विकास : ६५
के अन्तर्गत होती है । अतः अन्तर्मुख वृत्ति को तुर्य-रस से आप्लावित कर बहिर्मुख
जगत्रूप सुषुप्ति को भी इससे आप्लावित करने का दृढ़ अभ्यास करना योगी के लिए
आवश्यक है । इससे उदय और अस्त एक-सा बना रहता है । ऐसे सिद्ध योगी को
अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता में कोई भेद नहीं रहता है । उसे विमर्शानन्द का सदा
विकास रहता है ॥३९॥
सम्बन्ध—परन्तु, जब योगी इस अनुत्तर आनन्दमय अवस्था का सर्वात्मभाव से
इस प्रकार विमर्श न करता रहे, तब उसे देह, प्राण, पुर्यष्टक (जाग्रत्, सुषुप्ति और
स्वप्न) के प्रमातृता भाव में ही रहने से अपूर्णता-रूप आणवमल के कारण संसार के
सीमित विषयों की ओर हो गति रहती है । इस विषय में आगे का सूत्र है ।
अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य ॥४०॥
संवाह्यस्य—(सर्वात्मभाव से विमर्श न करने के कारण) कर्म का बोझ ढोने
वाले पशु को
अभिलाषाद्—(व्यक्तिगत) अभिलाषा से
बहिः—विषयों की ओर
गतिः—प्रसार होता है ।
व्याख्या—स्वरूप का अनुसंधान न करते रहने के कारण वह व्यक्ति देह, प्राण
और पुर्यष्टक की प्रमातृता में ही फँसा रहता है । उसका व्यवहार जाग्रत्, स्वप्न और
सुषुप्ति में ही रहता है । वह शक्ति-चक्र के आधार-भूत माया सहित कला विद्या आदि
षट्-कञ्चुकों से आगे शुद्धविद्या में प्रवेश नहीं पाता है । उसे लौकिक रूप अभिलाषाएँ
सताती हैं । अपूर्णता की मान्यता के कारण आणवमल उससे नहीं छूटता । यह सूक्ष्म मल
फिर स्थूल बनने लगता है । भिन्न-वेद्य-प्रथा से फिर मायीय मल बढ़ता है और उसका
मन विक्षेपमय बनकर विषयों की ओर ही जाता है । फलतः शुभ और अशुभ वासनाओं
से स्थूल कार्म मल की वृद्धि होती है जिससे वह संचित आगामी आदि कर्मों का बोझ
ढोते हुए (अन्तःकरण, बहिष्करण, शब्दादि तन्मात्र और पृथ्वी पर्यन्त भूतजाल में फँस
कर) नाना योनियों के चक्कर में पड़ जाता है । अन्तर्मुख स्वरूप की ओर फिर कभी
नहीं जाता है । जैसे 'कालिकाक्रम' में कहा है :
अतथ्यां कल्पनां कृत्वा पच्यन्ते नरकादिषु ।
स्वोत्थैर्दोषैश्च दह्यन्ते वेणवो वह्निना यथा ॥
अर्थ—असत्य वस्तुओं में सत्य भावना करके अपने ही दोषों से (ऐसे मूढ़ व्यक्ति)
नरकों में दुःखों से पीड़ित रहते हैं जैसे जैसे जंगल में बाँस (वायुवेग से) आपस में ही
टकराने के कारण अग्नि से भस्म हो जाते हैं । और भी (वह)
मायामयैः सदा भावैरविद्यां परिभुञ्जते ।
मायामयीं तनुं यान्ति ते जनाः क्लेशभाजनम् ॥
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