Skip to content
SarvaKosh
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

Page 88 of 108

Read in context
Page 88

६४ : शिवसूत्र विमर्श
व्याख्या—जब तक चित्त की गुणों से भिन्न सत्ता रहती है तब तक वह अपने
कारण में विलीन नहीं हो जाता, उसमें परिणाम होना अनिवार्य है । निरोधकाल में
चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकार के संस्कारों में व्याप्त रहता है। संस्कारों
में व्याप्त चित्त के व्युत्थान धर्म से निरोध-धर्म में परिणत होने को महर्षि पतञ्जलि
ने 'निरोध-परिणाम' (अथवा समाधि-परिणाम) का नाम दिया. है। यह अवस्था
व्युत्थान-संस्कारों के अन्तर्गत ही मानी गई है। जब चित्त भलीभांति अन्तर्मुखरूप से
समाहित होता है उसके बाद चित्त में जो परिणाम होता है उसे 'एकाग्रता-समाधि'
कहा है । उस अवस्था में शान्त होने वाली वृत्ति एक सी ही रहती है। योगी को
इसी की ओर प्रयत्नशील रहने का संकेत पतञ्जलि मुनि के इस सूत्र में है ।
'ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता परिणामः'
—(योगसूत्र ३–१२)
अतः अन्तर्मुख भाव में जब चित्त विद्युत्-प्रकाश की तरह क्षणमात्र के तुर्य-
चमत्कार से अनुप्राणित होता है तब आनन्द से भरा होने के कारण योगी को संतोष
होता है। फिर उसे इसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्न से बाह्य आभास रूप बहिर्मुखता
में भी अन्तः-विमर्श के बल द्वारा ही क्रमपूर्वक तुर्य रस से अनुप्राणित करना चाहिए
(देखिये : त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्-२०) । इससे योगी विश्व-अभेद-चमत्कार-मय
दशा मे स्थिति प्राप्त करता है । यह विमर्शानन्द का विकास है। श्री विज्ञानभैरव
में कहा है :
सर्वं जगत्स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।
युगपत्स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥६५॥
अर्थ—बाह्य के अभिमत वस्तुजात में सर्वत्र चिदानन्दघनरस से भरी हुई परिपूर्ण
शिवता की अपने दिव्यदेह में विभावना (चिन्तन) करने से योगी को अनुत्तर आनन्दमय
स्वरूपसमावेश होता है ।
यही भाव वाजसनेय श्रुति में कहा है :
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
अर्थ—वह परब्रह्म पूर्ण है और यह कार्यब्रह्म भी पूर्ण है क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही
उत्पत्ति होती है । तथा प्रलयकाल में पूर्ण कार्यब्रह्म का पूर्णत्व लेकर अपने में लीन
करके पूर्ण परब्रह्म ही बचा रहता है ।
इस प्रकार आनन्दरूपता की स्वातन्त्र्य-शक्ति सब दशाओं में स्फुट होती है जिससे
सम्पादन-सामर्थ्य (विश्व की स्थिति और लय करने की शक्ति) योगी के अपने अनुभव