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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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६६ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—परमार्थ अभ्यास आदि क्रमों को त्याग कर (ऐसे) लोग अविद्या में ही रहते
हैं। इस प्रकार अपने से ही उत्पन्न कामादि दोषों के कारण एक योनि से दूसरी योनि में
जाकर नरक-क्लेशों के भागी बनते हैं। अनुत्तर शिव-दशा तो कोसों दूर रहती है ॥४०॥
सम्बन्ध—जब योगी परमेश्वर के शक्तिपात से उदित स्वरूप का ही विमर्श करता
है तब किसी व्यक्तिगत अभिलाषा के अभाव से बहिर्मुख नहीं होता है अपितु आत्मा में
ही नित्य रमणशील रहता है। अब यह कहते हैं।
तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः ॥४१॥
तत्—तुर्यानन्द दशा में
आरूढप्रमितेः—संवित्-विमर्श में लगे योगी की
तत्—(व्यक्तिगत) अभिलाषा के
क्षयात्—नष्ट होने से
जीव—पुर्यष्टक प्रमातृभाव का
संक्षयः—शमन होता है।
व्याख्या—तुर्य-दशा में संवित्-धाम पर आरूढ़ योगी की अभिलाषाएँ क्षीण होती
चली जाती हैं। उसके पुर्यष्टक प्रमातृभाव अर्थात् कर्मों का बोझ ढोने वाले पशुभाव
का शमन होता है। उसका स्फुरण वित्प्रमातृभाव में ही सदा रहता है क्योंकि वह
कालग्रास—समाधि में तत्पर होता है और संसार-भाव से छूट जाता है। जैसे 'कालिका-
क्रम' में कहा है :
यथा स्वप्नानुभूतार्थान् प्रबुद्धो नैव पश्यति ।
तथा भावनया योगी संसारं नैव पश्यति ॥
अर्थ—जैसे अत्यन्त अल्प प्रदेश हृदय में, स्वप्नकाल के ही प्रकाश में आये हुए;
विचित्र उपवन, नदी, पर्वत, नगर आदि को मनुष्य जाग जाने पर नहीं देख पाता, वैसे
ही योगी चिद्रूपता की स्वतन्त्र भावना में चिन्मयता के अतिरिक्त संसार भाव को नहीं
पहचानता है।
चिद्रूपभाव में स्थित होते ही संसारभाव नष्ट होता है।
इस तरह कालग्रास-समाधि में तत्पर योगी कैवल्य पद का भोगी बनता है। उसे
इन्द्रिय और तन्मात्राओं के बोझ से पीड़ित नहीं होना पड़ता। उसके विकल्प ही विमर्श
होते हैं। वह प्राणापानरूपी जीवकला से ऊपर उठता है ॥४१॥
सम्बन्ध—अब प्रश्न उठता है कि जीवभाव के नष्ट होने पर देहपात होना चाहिये,
परन्तु इस सुप्रबुद्ध योगी का देह तो वर्तमान ही रहता है, ऐसी दशा में वह संवित्-धाम
में आरूढ़ कैसे रह सकता है ? इसके उत्तर में कहते हैं।