शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context३० : शिवसूत्र विमर्श
विशेष (आभ्यन्तर) प्राणायाम
मध्य पथ के द्वारा बहिर्द्वादशान्त की ओर प्राण-वायु का रेचक करके सन्धि-स्थान
पर कुम्भक करना चाहिये । फिर वायु को हृदय अर्थात् अन्तर्द्वादशान्त की तरफ लेकर
सन्धि पर फिर कुम्भक करना चाहिये । यह अभ्यास जब आयास के बिना ही होने
लगे तब इसे आभ्यन्तर प्राणायाम अर्थात् प्रशान्त-कुम्भक कहते हैं । यहाँ कुम्भक ही
सन्धि बन जाता है अतः निःस्पन्द कुम्भक कहलाता है । दैशिक कटाक्ष से यही ब्रह्मद्वार
के विकसित होने का अनुग्रहावसर है । तब 'सर्वमिदं अह च ब्रह्मैवेति' भावना दृढ़
होती है ।
इन प्राणायामों से प्राणवायु का संचार हल्का होने लगता है और इस प्रकार वायु-
प्रशमन (निरोध) होकर ऊर्ध्व-द्वादशान्त के लिए उदान-वायु द्वारा सुषुम्नाद्वार खुल
जाता है । यह सुप्रशान्त अर्थात् चतुर्थ प्राणायाम ही सर्वसिद्धिप्रद है । स्मरण रहे कि
यह प्राणायाम योगी साधक ही कर सकता है ।
(२) भूतजय के लिए पृथिवी आदि पाँच भूतों की धारणाएँ इस प्रकार करनी
होती हैं :
विराट् भावना में पञ्चभूतों को विभक्त करके पृथिवी को इससे दुगुने जल में, जल
को इससे दुगुने तेज में, तेज को इससे दुगुने वायु में और वायु को इससे दुगुने आकाश
में लय करना चाहिए । इस धारणा से योगी को भूतों पर विजय प्राप्त होती है और
वह शरीर की पीड़ाओं सिरदर्द आदि पर वश पा सकता है । शरीर में यह धारणा
हृदय देश के आधार से अंगुष्ठ, नाभि, कण्ठ आदि देशों में सद्गुरुप्रोक्त रीति से की
जाती है और ब्रह्मरन्ध्र में आकाश ग्रन्थि का भेदन कर साधक को द्वादशान्त में सब
सिद्धियां प्राप्त होती हैं ।
(३) भूतकैवल्य में चित्त को भूतों से प्रत्याहरण किया जाता है। भूतों को स्वरूप-
ज्ञान से भिन्न किया जाता है । चित्त मन से और विषयों से हटकर हृदय देश में ही
संचार करता है । यह दशा चतुर्थ अर्थात् सुप्रशान्त प्राणायाम (जिसका वर्णन ऊपर
नाड़ी संहार में किया गया है) से साधक को सिद्ध होती है ।
(४) भूतपृथक्त्व योगी की समाधि दशा है । इसके अभ्यास से भूतों के आवरण से
निर्मल हुआ चित्त स्वच्छन्द चिदानन्द भाव को प्राप्त होता है । यह योगी की निरुद्ध
अवस्था है । यह अवस्था आणवोपाय में प्रयत्न से ही साध्य है । जिस योगी को शाम्भ-
वोपाय का समावेश हुआ हो उसे यह अवस्था यत्न के बिना ही स्वाभाविक होती है ।
जैसे प्रथम उन्मेष के बीसवें सूत्र में कहा गया है :
"भूतसंधानभूतपृथक्त्वविश्वसंघट्टाः"
यहाँ आणवोपाय में योगी को इन अवस्थाओं की भावना करनी आवश्यक है ॥५॥
सम्बन्ध—स्वकारण में पञ्चभूतों की एक दूसरे में लय भावना करने से तत्त्ववशी-
करणरूपा सिद्धि प्राप्त होती है