शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextतृतीय विकास : २९
आणवोपाय से ध्यानादि श्रीमालिनीविजय तन्त्र में कहा है ।--
उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः ।
यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥
अर्थ--प्राणादि पंच द्वारा उच्चार से, खेचरी आदि मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से कदली
सम्पुटाकार की तरह हृदयादि में धारणा से जो पूर्ण समावेश हो उसे आणवोपाय द्वारा
ध्यान कहते हैं । इसका पर्यवसान शाक्तोपाय में होता है । ऐसी किसी भी युक्ति से जो
गुरूपदिष्ट हो लय-भावना द्वारा ध्यान करने से माया का प्रशमन होता है ॥४॥
सम्बन्ध--आणवोपाय से ध्यान की विधि कहकर अब उसके योग (अप्राप्त को पाना)
और क्षेम (प्राप्त किये की रक्षा) देने वाले प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि
कहते हैं ।
नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि ॥ ५ ॥
नाडीसंहार—प्राणापानादि का मध्यनाडी (सुषुम्ना) में संहार अर्थात् लय
करना (प्राणायाम),
भूतजय—पृथ्वी आदि भूतों का धारणाओं से वश करना (धारणा),
भूतकैवल्य—पंचभूतों का आत्मा से अलग करना अर्थात् चित्त का भूतों से
हटाना (प्रत्याहार) और
भूतपृथक्त्वानि—पंचभूतों से पृथक् होकर निर्मल तथा स्वच्छन्द चिदात्मा में
वास करना (समाधि)
—योगी को यह भावनाएँ करनी चाहिए ।
व्याख्या—आत्मव्याप्ति दृढ़ करने के लिए अन्य साधन हैं ।
(१) नाडीसंहार के प्रकार में प्राण, अपान, समान आदि मध्यनाडी (सुषुम्ना) में
लय करना है । इसके लिए सामान्य (बाह्य) दो प्राणायाम और विशेष (आभ्यन्तर) एक
प्राणायाम कहे गये हैं ।
क—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम
दायें नासापुट को दायें हाथ के अंगूठे से बन्द करके बायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे
अन्दर लेना चाहिये । इसे पूरक कहते हैं । फिर बायें नासापुट को मध्यमा अंगुली से
बन्द करके दायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे बाहर छोड़ देना चाहिये । इसे
रेचक कहते हैं। इस प्रकार तीन से पांच बार तक सामान्य रूप से करना चाहिये ।
इसके निरन्तर अभ्यास करने से नाडी-शोधन होता है अर्थात् मोक्षमार्ग के मध्य-धाम
का विकास होता है ।
ख—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम
ऊपर कहे हुए के अनुसार पूरक करके ही वायु को यथाशक्ति कुछ देर अन्दर ही
रोके रखना चाहिये । इसे प्राण-निरोध कहते हैं और यह कुम्भक है । इसके उपरान्त
रेचक करना चाहिये ।