शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextतृतीय विकास : ३१
से ही होती है तत्त्वज्ञान से नहीं । इस बात को आगे शिव-व्याप्ति के प्रकरण में स्पष्ट
करते हैं। शिवव्याप्तिलाभ होने पर योगी को समाधि और व्युत्थान दोनों दशाओं में
स्वस्वरूप की उपलब्धि रहती है। जिसे जगदानन्द कहते हैं ।]
मोहावरणात् सिद्धिः ॥६॥
मोहावरणात्—(आत्मव्याप्ति में) मोह का आवरण बना रहने से
सिद्धिः—(उस तत्त्व के भोग की) सिद्धि होती है (किन्तु परतत्त्व के प्रकाश
से वञ्चित ही रहता है)
व्याख्या—सूत्र पाँच में कहे हुए प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि के
साधन में लगे हुए साधक को परतत्त्व के प्रकाश होने से पूर्व मितसिद्धियाँ प्राप्त होती
हैं। उसे साधन काल में ही आत्मतत्त्व में व्याप्ति होती है। मितसिद्धियों में लगे रहने से
उसे परतत्त्व के प्रकाश में विघ्न आ जाते हैं। साधक को आत्मव्याप्ति में भी, सिद्धियों
से मोहित होने के कारण, माया का आवरण रहता है । अतः वह विद्वान् नहीं अपितु
मूर्ख ही है । पातञ्जलयोगदर्शन में कहा है :
"ते समाधावुपसर्गाः व्युत्थाने सिद्धयः" ॥३-३७॥
अर्थ—वे (सिद्धियाँ) परतत्त्व के ज्ञान (समाधि) प्राप्त करने में विघ्न हैं और व्यु-
त्थान में सिद्धियाँ है ।
जब आत्मव्याप्ति तक मोह पर विजय प्राप्त होती है तो योगी को समाधि में
चिदानन्द लाभ होता है ॥६॥
सम्बन्ध—परन्तु सात्त्विक विद्या प्राप्ति के लिए जगदानन्द लाभ करना आवश्यक
है । इस अवस्था में योगी को समाधि और व्युत्थान में परमानन्दानुभूति रहती है । इसे
शिवव्याप्ति कहते हैं । मोहावरण के नष्ट होने पर धारणादि षडङ्गयोग से भी परतत्त्व
का समावेश होता है । इसका निरूपण मृत्युजिद्भूट्टारक कथित नेत्रतन्त्र में इस प्रकार
मिलता है--
मध्यमं प्राणमाश्रित्य प्राणापानपथान्तरम् ।
आलम्ब्य ज्ञानशक्तिं च तत्स्थं चैवासनं लभेत् ॥
प्राणादिस्थूलभावं तु त्यक्त्वा सूक्ष्ममथान्तरम् ।
सूक्ष्मातीतं तु परमं स्पन्दनं लभ्यते यतः ॥
प्राणायामः स निर्दिष्टो यस्मान्न च्यवते पुनः ।
शब्दादिगुणवृत्तिर्या चेतसा ह्यनुभूयते ॥
त्वक्त्वा तां परमं धाम प्रविशेत्तत्स्वचेतसा ।
प्रत्याहार इति प्रोक्तो भवपाशनिकृन्तनः ॥
धीगुणान्समतिक्रम्य निर्ध्येयं परमं विभुम् ।
ध्यात्वा ध्येयं स्वसंवेद्यं ध्यानं तच्च विदुर्बुधाः ॥