Skip to content
SarvaKosh
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

Page 52 of 108

Read in context
Page 52

२८ : शिवसूत्र विमर्श
में मन का स्वकारण में लय हो । इसे लय-चिन्तनाभ्यास कहते हैं। जैसे विज्ञान-
भैरव में कहा है :-
भुवनाध्वादिरूपेण चिन्तयेत्क्रमशोऽखिलम् ।
स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या यावदन्ते मनोलयः ॥श्लोक५६॥
अर्थ—भुवन, तत्त्व, कला, पद, मन्त्र और वर्ण षडध्वाओं का वाच्य-वाचक व्यक्ति
के रूप में प्रतिलोम के क्रम से चिन्तन करना चाहिए । इस प्रकार इस चराचर जगत्
का स्थूल से सूक्ष्म में और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर में तब तक लय-चिन्तन का अभ्यास करते
रहना चाहिए जब तक अन्त में मन चित्स्वरूप में विलीन न हो । इस प्रकार के
अभ्यास का वर्णन वेदान्त में भी कहा गया है। योग-वासिष्ठ में यह वाल्मीकि-भरद्वाज
संवाद के अन्तर्गत स्पष्टरूप से मिलता है:—
व्यस्तेन च समस्तेन व्यापिना ग्रथितं जगत् ।
क्षितिं चाप्सु समावेश्य सलिलं चाऽनले क्षिपेत् ॥
अग्निं वायौ समावेश्य वायुं च नभसि क्षिपेत् ।
नभश्च महादाकाशे समस्तोत्पत्तिकारणे ॥
स्थित्वा तस्मिन् क्षणं योगो लिङ्गमात्रशरीरदृक् ।
....................................................
............................................
ततोऽर्धोऽण्डाद्बहिर्यातिस्तत्राऽऽत्मास्मीति चिन्तयेत् ॥
—(निर्वाण प्र०, पूर्वार्ध सर्गः २२८ श्लोक २६-२९)
अर्थ—पञ्चीकृत या अपञ्चीकृत आकाश से यह सारा जगत् ग्रथित है । योगी को
चाहिए कि वह पृथिवी का जल में लय करके उस जल को फिर तेज में लीन कर दे । तेज
को वायु में विलीन करके उस वायु को फिर आकाश में विलीन कर दे और आकाश को
समस्त स्थूल प्रपञ्चों की उत्पत्ति के कारणभूत हिरण्यगर्भाकाश में विलीन कर दे । उस
हिरण्यगर्भाकाश में एक मात्र लिङ्गशरीर धारण कर योगी क्षण भर स्थित रहे ।........
तदनन्तर स्थूल उपाधि का लय हो जाने से अर्धशरीर से सम्पन्न हुआ सा वह योगी
ब्रह्माण्डरूपता के अभिमान का त्याग करके उस से बाहर निकल कर सूक्ष्मभूतात्मक
लिङ्गसमष्टि देह में 'मैं ही आत्मरूप अधिष्ठाता हिरण्यगर्भ हूँ' यों चिन्तन करे । आदि ।।
दाह-चिन्तन प्रकार से ध्यान आगमों में इस प्रकार कहा है—
कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् ।
प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते शान्ताभासः प्रजायते ॥
--(वि० भै० श्लोक ५२)
अर्थ--रंबीजयुक्त कालाग्निरुद्र की ज्वाला वामपादाङ्गुष्ठ [बायें पैर के अंगूठे] से
उठती हुई अपने सारे शरीर को जलाती है ऐसा चिन्तन करे । अन्त में शान्त आभास
प्रकट होता है ।