शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextतृतीय विकास : २७
तत्त्वान्तर्गत प्रमाता अवस्था परामर्श वाणी
१ २ ३ ४
१. शिव प्रमाता अनाख्य — परा
(शक्ति के साथ अभिन्न तत्त्व)
२. मन्त्रमहेश्वर प्रमाता तुर्यातीत अहमिदम्
(सदाशिव तत्त्व)
३. मन्त्रेश्वर प्रमाता तुर्य इदमहम् पश्यन्ती
(ईश्वर तत्त्व)
४. मन्त्र प्रमाता तुर्यारम्भ इदमिदमहमहम्
(शुद्धविद्या तत्त्व)
यह यहाँ तक शुद्धाध्वा कहलाते हैं । अब आगे अशुद्धाध्वा बतलाते हैं ।
५. विज्ञानाकल प्रमाता★. सविद्यशून्य आणवमल
(माया और महामाया, दोनों
माया तत्त्व के अन्तर्गत)
६. प्रलयाकल प्रमाता सुषुप्ति आणव तथा मध्यमा
(कला से पुरुष-तत्त्व तक) मायीय मल
(सुखमहम्
अस्वाप्सम्)
७. सकल प्रमाता जाग्रत्-स्वप्न आणव, मायीय
(प्रकृति से पृथ्वी तक) तथा वैखरी
२४ तत्त्व कार्ममल
इस प्रकार कला से पृथ्वी तत्त्व तक यह तीस तत्त्व मायाकार्य होने के कारण स्व-
रूपोपलब्धि में बाधक होते हैं । अज्ञान का आवरण यथार्थ स्वरूप को ढंक लेता है।
इसी अज्ञान अथवा तत्त्वों के अविवेक को माया कहते हैं ॥३॥
सम्बन्ध—अतः इस माया के प्रशमन के लिए यहाँ उपाय कहते हैं । यह आत्म-
व्याप्ति का प्रकरण है। इसमें समाधि में ही आत्मलाभ का सुख मिलता है।
शरीरे संहारः कलानाम् ॥४॥
शरीरे—स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों में
कलानाम्—पृथ्वी में शिव तत्त्व तक सब तत्त्व भागों का
संहारः—अपने कारण में लय-भावना द्वारा (व्यक्तियों से ध्यान करना
चाहिए) ।
व्याख्या—महाभूत, पुर्यष्टक और समना तक जो स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर
हैं उनमें पृथ्वी से शिव तत्त्व तक सब कला-भागों का प्रतिलोम-वृत्ति से एक का दूसरे में,
दूसरे का तीसरे में, इस प्रकार लय-भावना द्वारा ध्यान करना चाहिये जब तक अन्त
★ यहाँ अनुसन्धान करने पर अनुसन्धान तथा न करने पर बहिर्मुखता ही रहती है।