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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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१२ : शिवसूत्र विमर्श
गया है। इसके अनुसार योगी की इच्छा जब व्यापकरूप धारण करती है तो वह अन्तः
तथा बाह्य रूप में इसी इच्छा के द्वारा किसी शरीर की उत्पत्ति कर सकता है। यह
शक्ति उसे स्वप्न तथा सुषुप्ति में भी सुलभ होती है ॥१९॥
सम्बन्ध—आगे और सिद्धियों का वर्णन करते हैं।
भूतसन्धान-भूतपृथक्त्व-विश्वसंघट्टाः ॥२०॥
भूत—देह-प्राण-पुर्यष्टकादि का
संधान—पोषण (अथवा सहायता) करना,
भूतपृथक्त्व—देहादि की पृथक्ता (और)
विश्वसंघट्टा:—विश्वात्मा के साथ एकीभाव होने से अपने शरीर को एक
से अधिक स्थानों पर एक ही समय प्रकट करना (इसकी और सिद्धियाँ हैं)।
व्याख्या—ऐसा योगी विश्वात्मस्वरूप का अनुभव करता हुआ इस योग्य होता है
कि वह (१) देह-प्राण आदि की सहायता करने में समर्थ होता है; (२) व्याधि आदि
क्लेशों को शान्त करने के लिये देहादि से किञ्चित् काल के लिये अलग हो जाता है और
(३) भिन्न-भिन्न स्थानों पर एक ही समय में अपने शरीर को प्रकट करता है। यह
विश्वमय दशा में इसकी कुछ परिमित सिद्धियाँ हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं:—
(१) यदि योगी का शरीर वृद्ध हो और युवा साथियों के साथ उसे किसी पर्वत
पर चढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ हो तो इस स्थिति में युवकजन स्वभावतः अल्प-आयास
से ही पर्वत के ऊपर आ सकते हैं। परन्तु देह-प्राण आदि की सहायता करने में समर्थ
योगी में यह सामर्थ्य होता है कि, देहादि को पृथक् करके विश्वात्मा में एकीभाव
होने की युक्ति से, पर्वत पर वृद्ध देह में भी अनायास ही चढ़ जाता है। देह की
शिथिलता उसे कोई बाधा नहीं पहुँचा सकती है।
(२) यदि योगी का शरीर प्रारब्धकर्मानुसार किसी व्याधि से ग्रस्त हो परन्तु
अवश्य-कर्तव्य कार्य सामने आ पड़े और व्याधि उस में बाधा डालती हो तो वह योगी
उस व्याधि को किञ्चित् काल के लिये शान्त कर सकता है। व्याधि को शरीर से
किञ्चित् काल के लिए अलग करके कार्यसिद्धि होने के उपरान्त फिर उस का ग्रहण
प्रारब्ध-भोग के लिये करता है।
ऐसा सुनने में आया है कि एक योगी-जन अपने आसन पर स्वरूप-चिन्तन में लीन
था। पास ही एक लोई पड़ी थी जिस में स्वयमेव कम्पन होता था। एक भक्त के
आने पर योगी महाराज ने आँखें खोलीं और लोई को अपने शरीर पर ओढ़ लिया।
इसके साथ ही योगिराज के शरीर में कम्पन आरम्भ हुआ। आश्चर्यचकित भक्त ने
पूछा, 'महाराज, यह मैं क्या देख रहा हूँ। आप अभी स्वस्थ थे परन्तु ज्योंही आपने
लोई ओढ़ी त्योंही आप का शरीर ज्वर से काँप उठा है।' योगी जी ने कहा, 'प्रियवर !
प्रारब्धानुसार यह शरीर रोगग्रस्त है। ज्वर से पीडित होने के कारण कम्पन हो रहा