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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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प्रथम विकास : १३
है। ईश्वर का भजन शान्ति से हो इस कारण इस व्याधि को किञ्चित्कालमात्र के लिए
इस लोई में रखा था।'
(३) योगिराज भगवान् कृष्ण की विश्वमयदशा का वर्णन हमें पुराणों में मिलता है।
वह एक हो समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर अपने दिव्य शरीर को प्रकट करते थे। रास-
क्रीडा में प्रत्येक गोपी के साथ एक एक कृष्ण नृत्य में रत रहता था और बीच में भी
राधा के साथ मुरलीवादन करता कृष्ण होता था ॥२०॥
सम्बन्ध—जब इन परिमित सिद्धियों को न चाहता हुआ विश्वात्मप्रथारूप परा
सिद्धि को ही चाहता है तब योगी तुर्य दशा का अनुभव करता है।
शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥२१॥
शुद्धविद्योदयात्—शुद्ध निर्मल विद्या (बोध) से
चक्रेशत्वसिद्धिः—स्वरूपसमाधि की सिद्धि (होती है)।
व्याख्या—विश्वात्मरूपता का ज्ञान जब निर्मल होता है तब अन्तर्मुखभाव सिद्ध
होता है। यह योगी की विश्वोत्तीर्ण दशा है। इसे तुर्यदशा कहते हैं। 'मैं ही यह जगत्
आदि सब कुछ हूँ' यह माहेश्वरी दृष्टि सिद्ध होती है ॥२१॥
संबन्ध—अब योगी की तुर्यातीत दशा का अनुभव कहते हैं।
महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः ॥२२॥
महाह्रद—(स्वच्छ अनावृत तथा गम्भीर धर्मों से युक्त होने के कारण
बोध हो) बड़ा समुद्र (कहलाता है)
अनुसन्धानात्—(उस बोध में) अनुसन्धान करने से अर्थात् लगातार
उसके साथ तादात्म्य-विमर्श से (योगी का)
मन्त्रवीर्य—पूर्णाहन्ता (में)
अनुभवः—प्रवेश (होता है)।
व्याख्या—परासंवित् स्वच्छ, निर्मल और गम्भीर होने से महासमुद्र है। इस बोध-
सुधाब्धि का अन्तर्मुखभाव से लगातार अनुसन्धान होने पर योगी को शिवस्थितिरूप
निर्व्युत्थानसमाधि का अनुभव होता है। वह पूर्णाहन्ता में प्रवेश करता है। यह
विश्वमयदशा है। योगी इस दशा में जगत् के हानादान-व्यवहार में भी युक्त होता है
और स्वरूपस्थित भी होता है। इसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी-पद भी कहते हैं। ऊपर कहे हुए
१९ और २० सूत्रों के ऐश्वर्य योगी को स्वरूप से दूर ले जा सकते हैं परन्तु २१ और
२२ सूत्र के ऐश्वर्य इसे अधिकाधिक बोधसुधाब्धि में ही मज्जन कराने में समर्थ
होते हैं ॥२२॥
इस प्रकार शिवसूत्र का शाम्भवोपाय-प्रकाशन
नामक प्रथम विकास समाप्त हुआ