शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextप्रथम विकास : ११
वितर्क आत्मज्ञानम् ॥१७॥
वितर्कः — 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस प्रकार का जो विचार अथवा
विमर्श है, यह निश्चय ही
आत्मज्ञानम् — आत्मा के स्फार का ज्ञान (इस परम योगी के लिये) है।
व्याख्या — आत्मानुसन्धान में स्थित होने से ऐसे योगी के बन्धन नष्ट हुए होते
हैं। शिवोऽहं भावना में प्रपञ्च का तन्मयीभाव उस को हुआ होता है। अतः उसके
संकल्प-विकल्प रूप साधारण विचार भी आत्मरूपता में स्फुरित होते हैं। उसे तो
'स्याम तन, स्याम मन, स्याम ही हमारो धन' की भावना से जगत् के सब विचार
आत्ममय ही होते हैं। वह 'अकिञ्चिच्चिन्तक' योगी है ॥१७॥
सम्बन्ध — आगे के तीन सूत्रों में कहते हैं कि वह योगी मायावी जगत् में योगै-
श्वर्य का चमत्कार कैसे लेता है। यह उसकी विश्वमय दशा है। अब (अकिञ्चि-
च्चिन्तक) स्वात्मविज्ञान से सुशोभित योगी के लिये समाधिसुख क्या है, यह बताते हैं।
लोकानन्दः समाधिसुखम् ॥१८॥
लोकानन्दः — अन्तःकरण और बहिष्करण में चित्प्रकाश का चमत्कार
समाधिसुखम् — (स्वात्माराम योगी का) समाधिसुख है।
व्याख्या — स्वात्माराम योगी सब देहधारियों में विलक्षण चमत्कारपूर्ण होता है।
वह पूर्णाहन्ता के सहज अनुभव से (अथवा प्रमातृ-पद पर विश्रान्ति पाने से) लोक के
प्रत्येक पदार्थ में स्वरूप-स्फुरण का ही चमत्कार लेता रहता है। यही उसका समाधि-
सुख है। कहा भी है —
ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् ।
योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥
अर्थ — सब देहधारियों में ग्राह्य पदार्थ और ग्राहक का ज्ञान सामान्य है। परन्तु
योगियों में विशेष बात यह है कि वे इन दोनों की सन्धि में सावधान रहते हैं।
यही सावधानता ऐसे योगी की समाधि है और नित्यानन्दभाव में स्थिति है।
अथवा इस सूत्र का दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है — उस योगी का यह समाधि-
सुख लोगों के लिये कल्याण तथा आनन्द को देने वाला बन जाता है। इस के समाधि-
सुख में रहने से ही लोगों का कल्याण होता है ॥१८॥
सम्बन्ध — अब इस योगी के विभूतियोग (सिद्धियों) का वर्णन करते हैं।
शक्तिसंधाने शरीरोत्पत्तिः ॥१९॥
शक्तिसंधाने — इच्छाशक्ति के तन्मयीभाव होने पर
शरीरोत्पत्तिः — यथाभिमत शरीर की उत्पत्ति हो जाती है।
व्याख्या — तेरहवें सूत्र में योगी की पारमेश्वरी इच्छा शक्ति को क्रीडनशीला कहा