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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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१० : शिवसूत्र विमर्श
सम्बन्ध—उपायक्रमाभ्यास कहकर अब अनुपाय-क्रमाभ्यास में अनादिसिद्ध शिवदशा
का वर्णन करते हैं । यह पूर्णाहंता-विमर्श में दूसरा उपाय है ।
शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वा अपशुशक्तिः ॥१६॥
वा—दूसरे उपाय (अनुपायक्रमाभ्यास) से
शुद्धतत्त्व—(परम शिवरूप) शुद्धतत्त्व में
अनुसंधानात्—प्रपञ्च के ('विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ', इस) तन्मयभाव से
अपशुशक्तिः—जगत् के पति शिव (अर्थात् जीवभाव रहित) शक्ति (का अनु-
भव योगी को होता है) ।
व्याख्या—दूसरे उपाय अर्थात् अनुपायक्रमाभ्यास से जब योगी परमशिवरूप शुद्धतत्त्व
में 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस भावना के दृढ़ अभ्यास से प्रपञ्च की तन्मयता का
अनुभव करता है तब उसे पशु अर्थात् जीवभाव की बन्धशक्ति नहीं रहती और वह
सदाशिव की तरह जगत् का पति बन जाता है । पूर्णाहंता में स्थित यह योगी समाधि
का अभ्यास करे अथवा न करे, इससे उसे कोई प्रयोजन नहीं है । योगवासिष्ठ में
कहा है—
समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा ।
हृदयेनास्तसर्वाशो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥
अर्थ—जिसके अन्तःकरण में शिवोऽहम् भावना के दृढ़ होने पर सब प्रकार की द्वैत-
मूलक आशायें अस्त हो गई हैं वह (योगी) समाधि का अभ्यास करे अथवा न करे,
देहादि सम्बन्धी कर्म करता रहे अथवा न करे, उत्तम आशय वाला सदा ही मुक्त माना
जाता है । ऐसे योगी के लिये हठसमाधि का अनुष्ठान भी बन्धन ही है । अष्टावक्रगीता
में कहा गया है—
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः ।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ (१५-१)
अर्थ—तू सर्वसम्बन्धशून्य, फलाकांक्षा की क्रिया से रहित, शुद्धतत्त्वरूप स्वप्रकाश
और अभेदभावना से निर्मल है । इस कारण सविकल्प हठसमाधि का अनुष्ठान भी तेरा
बन्धन है ।
अतः स्वरूपज्ञान के अतिरिक्त किसी उपाय का अनुष्ठान मात्र भी ऐसे आत्मज्ञानी
योगी के लिये बन्धन ही है । वह प्रारब्धानुसार यथाप्राप्त स्थिति में भी निरावरण
स्वरूपलाभ से युक्त है ॥१६॥
सम्बन्ध—शुद्धतत्त्व में अनुसंधान वाले जिसके बन्धन नष्ट हो चुके हैं ऐसे योगी के
लिये साधारण विचार भी स्वात्मविमर्शरूप ही होते हैं, अब यह बताते हैं ।