शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextप्रथम विकास : ९
पहुँचे । इन्द्र अपने विनोद में मस्त थे। वह भगवान् शिव का स्वागत करने अपने
आसन से नहीं हिले । भगवान् शिव अन्दर आये और अपनी जटाओं को एक झटका
मारा तो आसपास के दो पर्वत आपस में टकराने लगे । इस से नृत्य, संगीत और
हाथियों की टक्कर यह सब नष्ट-भ्रष्ट होने लगा । इन्द्र ने डर कर कहा, "भगवन् !
यह क्या हुआ और कैसे हुआ ?" भगवान् शिव ने कहा कि विषयभोग में अपना विनोद
मानना सांसारिक सुख-दुःख देता है । सारे दृश्यवर्ग में अहंता के अनुभव से विश्व का
सर्जन तथा संहार अपनी क्रीडा ही तो होती है ।
इस सूत्र का अर्थ दूसरे प्रकार से भी किया जा सकता है। वह है—
शरीरं दृश्यम् ॥
शरीर—देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि (जिसको साधारण जन अहंता रूप से
देखते हैं)
दृश्यम्—(उसे भी वह) इदं रूप (में देखता है) ।
व्याख्या—वह योगी देह, प्राण आदि सब को आत्म-सत्ता से अलग समझ कर
स्वरूप-चैतन्य से विचलित नहीं होता । उसका निश्चय होता है कि आत्मसत्ता के बिना
देहादि ठहर नहीं सकते । अतः यह चित्स्वरूप से भिन्न हैं और त्याज्य हैं, उसे अपना
शरीर भी ऐसा ही प्रतीत होता है । इस प्रकार वह योगी देहादि को इदंरूप जानकर
भेद का निराकरण करके स्वयं पूर्णाहन्ता में मग्न रहता है ॥१४॥
सम्बन्ध—इस प्रकार जगद्रूप दृश्य को अहंकरूपता से स्वरूप में अथवा देह, प्राण,
पुर्यष्टक आदि को इदंरूप दृश्यवर्ग मानकर योगी संसार को कैसे देखता है, यह अगले
सूत्र में बताते हैं।
हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् ॥१५॥
चित्तसंघट्टात्—चंचल चित्त की एकाग्रभावना से (ऐसा योगी)
हृदये—संवित् में (अथवा चेतनता की पूर्णता के अनुभव में)
दृश्य—जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्था-रूप दृश्य (इदंता-रूप प्रमेय वर्ग) और
स्वाप—सुषुप्तिरूप दृश्य (अहंतारूप प्रमातृवर्ग को)
दर्शनम्—(अद्वैत भावना के दृढ़ होने के कारण) आत्मस्वरूप ही देखता है ।
व्याख्या—चित्त स्वभाव से चंचल है । योगी जब एकाग्रभावना में दृढ़ होता है तो
चेतनता की पूर्णता में अहंता का अनुभव करने लगता है । संवित् के इस महाबोध में
वह जाग्रत् तथा स्वप्नरूप दृश्य और सुषुप्ति-रूप दृश्य को आत्मस्वरूप में ही देखता है ।
इस आरोहक्रम के अभ्यास में वह भाव और अभाव रूप जगत् को अपना अंग मानकर
स्वरूपचमत्कार का आनन्द लेता है । यह उपायक्रमाभ्यास से मुक्तशिव की अवस्था
है ॥१५॥