सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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आनंद लहरी
आदौ गणपतिं नत्वा, नत्वा शिवं जगद्गुरुम् ।
आचार्य शंकरं नत्वा भजे त्रिपुरसुन्दरीम् ॥
सौन्दर्य लहरी १०३ श्लोकों का एक बृहत् स्तोत्र है जो
श्री १००८ आदि शंकराचार्य शंकर भगवत्पाद का विरचित है।
इस स्तोत्र में भगवती की स्तुति की गई है। कविता और साहित्य की
दृष्टि से भी इसका स्थान ऊंचा है। परन्तु विवर्तवाद के प्रवर्तक
की लेखनी से निकला हुवा यह स्तोत्र तांत्रिक उपासना के रहस्यों
पर प्रकाश डालता है और साथ ही प्रक्रियात्मक योग साधन की
आवश्यकता सिद्ध करता है, इसलिये साधकों के लिये इसका
विशेष महत्व है। सौन्दर्य लहरी की विशेषता इस बात में है कि
केनोपनिषद् की बहुशोभमाना उमा हैमवती, अथवा पुराणों की
उमा हिमशैल-सुता पार्वती के मानुषी स्त्री रूप को सामने रखते
हुए भी उसे सृष्टि की आदि कारण भूता शक्ति, योगियों की
षट्चक्राधिष्ठात्री कुण्डलिनी शक्ति, तांत्रिक श्री चक्रस्थ श्री विद्या की
अधिदेवता महात्रिपुरसुन्दरी, और सकल ब्रह्माण्ड में स्थूल रूप से
स्वयं व्यक्त होने वाली विराट अधिभूता शक्ति का निर्गुण ब्रह्म की