सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextमोहन चक्र के तीसरे चतुष्कोण की प्रकट योगिनियां, अर्थात्
सर्व संक्षोभिणी, सर्व विद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्व वशंकरी,
सर्वोन्मादिनी, सर्व महाङ्कुशा, सर्व खेचरी, सर्व बीजा और सर्व
योनि मुद्रा शक्तयः) । त्वगादि सप्त धातुओं से अनेक प्रकार
संयुक्त संकल्प कल्पतरु हैं, तेजकल्पकोद्यान हैं। (श्लोक ८)
जिह्वा के मधुर, अम्ल, तिक्त, कटु, कषाय और क्षार (लवण)
भेद से छः रस छः ऋतु हैं। क्रियाशक्ति पीठ है, ज्ञानशक्ति
कुण्डलिनी घर है, और इच्छाशक्ति महात्रिपुर सुन्दरी हैं। ज्ञाता
होता, ज्ञान अग्नि और ज्ञेय हवि हैं; तीनों की अभेद भावना
श्रीचक्र पूजन है। नियति सहित श्रृंगार, विभत्स, रौद्र, अद्भुत,
भयानक, वीर, हास्य, करुण और शान्त ये ९ रस, त्रैलोक्य
मोहन चक्र के प्रथम बहिर चतुष्कोण पर स्थित् अणिमा, लघिमा,
महिमा, ईशत्व, वशित्व, प्राकाम्य, भुक्ति इच्छा, प्राप्ति और मुक्ति
१० सिद्धियां हैं (श्लोक ५१) । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद,
मात्सर्य, पुण्य और पाप मध्य चतुष्कोणास्था ब्राह्मी, माहेश्वरी,
कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा और महालक्ष्मी
८ मातृ देवता हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश; श्रोत्र,
त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण; वाक्, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ, और
मनोविकार सर्वाशा परिपूरक दूसरे आवरण के १६ दलों पर
स्थित कामाकर्षिणी, बुद्धया कर्षिणी, अहंकाराकर्षिणी, शब्दस्पर्शा
रूपरसगंधाकर्षिणि, चित्ताकर्षिणी धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी,