सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी, आत्माकर्षिणी, अमृता कर्षिणी और
शरीराकर्षिणी १६ नित्या कला गुप्त योगिनियां हैं। बोलना, चलना,
पकडना, मलमूत्र का विसर्जन करना मैथुन, हानि, लाभ और
उपेक्षा बुद्धि, सर्व संक्षोभण संज्ञक तीसरे आवरणके ८ दलों पर
स्थिता अनङ्ग कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, वेगिनी,
अङ्कुशा और मालिनी ८ गुप्ततर योगिनियां हैं । अलंबुसा, कुहू
विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा यशस्वती अथवा पयस्विनी, अश्विनी,
गांधारी, पूषा, शंखिनी, सरस्वती, ईडा, पिङ्गला, और सुषुम्ना ये
१४ नाडियां सर्व सौभाग्य दायक चतुर्थ चतुर्दशार आवरण के
१४ त्रिकोणों पर स्थिता सर्व संक्षोभिणी, सर्व विद्राविणी, सर्वा-
कर्षिणी सर्वाल्हादिनी, सर्वसंमोहनी सर्वस्तंभिनी, सर्वजृंभिणी,
सर्ववशंकरी, सर्वरंजनी, सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सर्वसंपत्ति
पूरिणी, सर्वमंत्रमयी, और सर्वद्वंद्वक्षयंकरी १४ संप्रदाय योगिनियां
हैं । प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म, कृकर,
देवदत्त और धनजय १० वायु सर्वार्थ साधक संज्ञक बहिर्दशार
गत पांचवें आवरणके १० त्रिकोणों पर स्थिता सर्वसिद्धिप्रदा,
सर्वसंपत्प्रदा, सर्वप्रियकरी, सर्वमंगलकरी, सर्वकामदा, सर्वदुखःविमो-
चिनी, सर्वमृत्यु प्रशमनी, सर्वविघ्न निवारिणी, सर्वाङ्ग सुन्दरी, और
सर्वसौभाग्य दायिनी १० कुलोत्तीर्ण योगिनियां हैं । उक्त दस वायु
के संसर्ग की उपाधि भेद से जो रेचक पूरक, शोषक, दाहक,
प्लावक पंचप्राणादि की अमृत रूपी पालन करने वाली क्रियाएं