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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 339 of 415

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Page 339

सौंदर्य लहरी १८१
ऊरुयुग्मका ध्यानः—
( ८२ )
करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामुरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमपि ॥
कठिन शब्दः—पटली=पटं विस्तारं याति आददाति,
अर्थः—हे गिरि सुते । आप अपने दोनों ऊरुओं से
गजेन्द्रों के सूंडों को और सुवर्ण के बने हुए केले के लंबे स्तंभों
को जीतकर, पति को प्रणाम करते २ कठिन हो गये हैं
ऐसे दोनों सुन्दरगोल घुटनो से बुद्धिमान हाथीके दोनों (मस्तक के)
कुंभों को भी पराजित कर रही हैं !
जंघाओं का ध्यानः—
( ८३ )
पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भो गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमुकुटशाणैकनिशिताः ॥
कठिन शब्दः—निषङ्ग=तरकस, विशिखः=शर, बाण; विषम
विशिखः=कामदेव