सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 340 of 415
Read in context२९० सौन्दर्य लहरी
अर्थ:—हे गिरि सुते ! तेरी दोनों पिंडलियां रुद्र को
जीतने के लिये दुगुने बाणों से भरे कामदेव के दो तरकसों के
समान हैं । जिनके अग्रफल पैरों की १० अंगुलियों के नखों के
अग्र भाग के रूप में दस दिख रहे हैं, जो देवताओं के
मुकुट रूपी सान पर पैनाए गये हैं ।
भाव यह है कि कामदेव के तरकस में केवल ५ पुष्प बाण हैं,
उनसे वह शंकर को नहीं जीत सका, इसलिये उसने भगवती के
चरणों की अंगुलियों के नख रूपी फल वाले १० और बाण अपनी
सहायता के लिये लेलिये हैं, जो दोनों पिंडलियों रूपी तरकसों में
पांच २ रखे हैं । इन बाणों के फल वत् नखों के अग्रभाग देवताओं
के प्रणाम करते २ उनके मुकुट रूपी सान पर घिसर कर
पैने हो गये हैं ।
कामदेव के ५ बाण शब्द स्पर्श रुप रस गंध ५ विषय हैं ।
भगवती के चरणों में ५ सामान्य और ५ दिव्य शब्द स्पर्श रूप रस
गंध सहित १० बाण हैं । योगदर्शन में दिव्य विषयों का वर्णन
(१-३५) सूत्र में मिलता है । ‘विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः
स्थिति निबंधिनी’ । (१-३५) विषयों की दिव्य प्रवृत्ति उत्पन्न
होने पर मन की स्थिरता का उदय होता है । इसलिये भगवती के
चरणों के नखों का ध्यान योगी को सामान्य और दिव्य भोग देकर
चित्त को एकाग्रता प्रदान करता है । मानों कामदेव के ५ बाणों के
स्थान पर भगवती के चरणों की शरण लेकर दस बाणों से शंकर
को जीतना चाहता है, परन्तु मन की एकाग्रता हो जाने से मनुष्य
स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है ।