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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 338

२८८ सौन्दर्य लहरी
नितंब का ध्यानः—
(८१)
गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजात्
नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥
कठिन शब्दः—हरणरूपेणं=दहेज,
अर्थः—हे पार्वति ! पर्वतराज हिमालय ने अपने नितंबों
से काटकर अपना भारीपन और विस्तार तुझको दहेज में दिये
थे, इसीलिये तेरे नितंब इतने विस्तीर्ण और भारी हैं, कि तेरे
नितंब के भार से सारी पृथिवी की गति रुक गई है और तेरे
विस्तार की अपेक्षा से पृथिवी छोटी दिखने लगी है ।
यदि पृथिवी को स्थिर मानें तो भगवती के उसपर बैठ जाने
से उसकी गति रुक गई है और यदि उसे चल माने तो उसकी गति
स्थगित होकर नियम बद्ध हो गई है । भाव यह है कि प्रकृति देवी
ने पृथिवी को अपना आसन बना रखा है । और भूमि पर जो भी
शोभा फैली हुई है, उसका सारा श्रेय पर्वतों को ही है, जिनकी देन
रूपी स्रोत सारी पृथिवी को हरा भरा ही नहीं कर रहे, वरन्
बडे २ देश उनके नितंबों से काटकर लाई हुई मिट्टी की ही कृपा
है । अर्थात् भूमि की प्राकृतिक शोभा हिमाच्छादित पर्वतराज
की ही तनुजा है ।