सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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कुचौ सद्यः स्विद्यत्तट घटित कूर्पासभिदुरौ
कपन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयतः ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधानद्धं देवि त्रिवलिवलिवल्लिभिरिव ॥
कठिन शब्दः— कूर्पास=अंगिया, चोली । दोर्मूल=कांख, बगल,
वलग्नं=जुड़ासा जोड, तनुभू=काम देव ।
हे देवि ! कांखों की रगड से झट २ पसीना आने के कारण
जिनके किनारे पर से अंगिया फट गई है सुवर्ण कलश की आभा-
युक्त तेरे कुच द्वय के हिलने से टूटने से बचाने के लिये अलम्
अर्थात् पर्याप्त हैं इतना मात्र जुडा हुआ तेरा ( कटि प्रदेश ) मानो
काम देव ने लवली वल्लि ( एक प्रकार की बेल ) से वलियों से
तीन बार बांध रखा है ।
भाव यह है कि छाती का भाग भारी है और नीचे कटि
प्रदेश इतना पतला है कि हिलने मात्र से टूट सकता है, परन्तु पेट
की तीन बलियां ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो काम देव ने उसके
सौन्दर्य की रक्षा करने के लिये लवली की बेल से तीन बार लपेट
कर बांध रखा है । नहीं तो टूटने में कोई कसर नहीं जान पडती थी।