सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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इस संबंध में एक शंका बहुदा यह भी उठाई जाती है कि शंकर
भगवत्पाद विवर्तवाद के प्रवर्तक थे वे परिणामवाद के कदापि समर्थक
नहीं बन सकते थे, परन्तु सौंदर्य लहरी में स्पष्ट रूप से परिणामवाद
का समर्थन किया गया है, देखें श्लोक १ और ३५ । इस शंका का
उत्तर स्वयं भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (२, १, १४) के भाष्य की अंतिम
पंक्ति में इन शब्दों में देते हैं:—'अप्रत्याख्यायैव कार्य-प्रपंचं परिणाम
प्रक्रियां चाश्रयति सगुणेषु उपासनेषूपयोक्ष्यते इति ।' अर्थात् कार्य प्रपंच
को सिद्ध करने के लिये नही वरन् सगुण उपासना के उपयोग के
लिये परिणामवाद का सूत्रकार ने आश्रय लिया है । भगवत्पाद ने ब्रह्म
सूत्रों में सर्वत्र सत्कारणवाद को सिद्ध करते समय जगत् को सत्शक्ति
का परिणाम ही सिद्ध किया है । आगे चलकर ब्रह्म सूत्र (२,१,२४)
के भाष्य की अन्तिम पंक्ति में भी वे इन शब्दों में उपसंहार करते
हैं:—'तस्मादेकस्यापि ब्रह्मणो विचित्रशक्तियोगात्क्षीरादिवत् विचित्र
परिणाम उपपद्यते' ।
श्रीविद्या का प्रचार मद्रास प्रान्त में अधिक है, उत्तर भारत में
उसका सर्वथा अभाव-सा प्रतीत होता है, यहां तक कि उत्तर भारत
का विद्वत्समाज इस विद्या से अनभिज्ञ दिख पडता है । इसलिये हमने
सौंदर्य लहरी पर यह व्याख्या हिंदी जानने वालों के लाभार्थ हिंदी में
लिखने का साहस किया है । यद्यपि यह विषय प्रधानतया तान्त्रिक है,
परन्तु हमने अपने विचारों की पुष्टि में उपनिषद् गीता जैसे सर्वमान्य
शास्त्रों का ही उद्धरण इस दृष्टि से किया है कि तंत्रों का साहित्य
वाममार्ग की कुत्सित प्रथाओं के कारण सामान्य जनता में अच्छी दृष्टि
से नहीं देखा जाता । परन्तु हम साथ ही पाठकों को यह भी बता--