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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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मिली थी । सुभगोदय का अर्थ 'सुभगा का उदय' अर्थात् 'कुण्डलिनी
शक्ति का जागरण' किया जा सकता है । श्री शंकराचार्य विरचित
प्रपंचसार संग्रह तंत्र भी इस बात की पुष्टि करता है, जिस पर
भगवत्पाद के शिष्य श्री. पद्मपादाचार्य ने टीका लिखी है । शार्दा-
तिलक के टीकाकार राघवभट्ट ने अपनी ई. १४९३ में लिखित टीका
में उसका उल्लेख किया है । इन प्रमाणों के होते हुए सब शंकाएं
निरर्थक हैं । वेदोंके भाष्यकार सायनाचार्य ने भी प्रपंचसार संग्रह पर
एक टीका लिखी है, और वेदान्त कल्पतरु अध्याय १ पाद ३
अधिकरण ८ सूत्र ३३ में भी प्रपंचसार संग्रह का उल्लेख मिलता है
और वहां वह तंत्र शारीरकभाष्यकार श्री शंकर भगवत्पाद का लिखा
हुआ बताया जाता है ।
हमारी तो इन ऐतिहासिक समस्याओं से अधिक दिलचस्पी नहीं
है,इसलिये इतना ही लिखना पर्याप्त समझते हैं,कि शारीरकमीमांसाभाष्य
के पढने से यह बात स्पष्ट है कि शंकर भगवत्पाद ने वेद वेदान्ता-
नुकूल स्मृत्युक्त सब योग और उपासनाओं को अंगीकार किया है
और वेदवेदान्त विरुद्ध सिद्धान्तों का परिहार किया है, इसलिये तांत्रिक
योग पद्धतियों और उपासनाओं को भी अपनाने में उनको आपत्ति
नहीं हो सकती थी, जहां तक कि वे वेदवेदान्त का समर्थन करने
वाली हैं, और प्रपंचसार संग्रह एवं सौंदर्य लहरी की सैद्धांतिक
भूमिका श्रौत मार्ग के विपरीत नहीं है अपितु श्रौत सिद्धान्तों का समर्थन
करती है । और जबकि सब ही पराचीन और अर्वाचीन विद्वानों का
बहुमत इस बात के पक्ष में है कि सौंदर्य लहरी भगवत्पाद की ही
रचना है तो उसके विरुद्ध शंका उठाकर वादविवाद में पडना
वांछनीय नहीं ।