सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौन्दर्य लहरी २६३
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किंचानुजानाति ॐ इत्येव तदा हैषा
एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति यस्तदेवं
विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।
यहां भगवती जब अनुज्ञा सूचक सिर हिलाती हैं, तो उनके
कानों के कुंडल मानो ‘ॐ’ का उच्चारण कर के अनुज्ञा प्रकट करते
हैं, क्योंकि सरस्वती की सुन्दर वाणी रूपी अमृत का पान कर्ण ही
करते हैं, यदि जिह्वा पान करती होती तो जिह्वा वाणी द्वारा अनुज्ञा
प्रकट करती, परन्तु यहां कान पान करते हैं, इसलिये जिह्वा मौन है
और कान बोल नहीं सकते, इसलिये कानों के बदले कानों के कुण्डल
बज बज कर झणत्कार रूपी ॐ ॐ कहकह कर अनुज्ञा प्रकट कर
रहे हैं। कुण्डलों की झंकार रूपी ॐकार की ध्वनि युक्त उद्गीथ
उपासना का फल समृद्धि होना चाहिये, जैसा कि उपरोक्त छान्दोग्य
श्रुति में कहा गया है, उस समृद्धि का वर्णन अगले श्लोक में है।
नासिका ध्यान
[ ६१ ]
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि (पटे)
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतर निश्वास वटिताः (गलिताः)
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥
कठिन शब्दों के अर्थः— तुहिन=हिम. नेदीयस्=अति निकट
शीघ्र, तुरन्त ।