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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 276

२२६ सौन्दर्य लहरी
सेवा में आ उपस्थित हों और रोगों के निवारणार्थ गुरु घबरा कर
साधारण डाक्टरों वैद्यों का आश्रय ढूंढता फिरे, तो उसके योग को
बट्टा लग जाने की आशंका है। और उससे शिष्य की श्रद्धा में भी
ठेस लगने की संभावना है।
भोग और रोग दोनों पूर्वार्जित प्रारब्ध कर्मों का भी फल हो
सकते हैं, जिनका योग की सिद्धि से कोई संबंध नहीं होता, परन्तु
एक योगी और ज्ञानी महापुरुष से यह भी आशा की जाती है कि
वह वीतराग होने के कारण भोगों में फंसेगा नहीं, और योगज और
प्रारब्धज दोनों प्रकार के भोगों को पास नहीं फटकने देगा, यदि
उनसे रोग उत्पन्न होते दिखते हैं, और यदि प्रारब्धवश रोगों का
आक्रमण भी हो, तो अपने योग बल से उनको परास्त करता हुआ
उन्हें वह सहन करेगा, न कि साधारण मनुष्य के सदृश भोगासक्ति
का कुपथ्य करके उनका पोषण करेगा।
यदि किसी गुरु को भोगासक्त और रोगाक्रांत देखा जाय, तो
स्वभावतः शिष्य की श्रद्धा भंग हो जाने में आश्चर्य नहीं। परन्तु
उसका दुष्परिणाम शिष्य के लिये उसके सर्व-नाश का कारण
बन जाता है।
तैत्तिरीयोपनिषत् की ब्रह्मानन्दबल्ली के चतुर्थ अनुवाक् में श्रद्धा
को विज्ञानात्मा का शिर बताया गया है, और योग को उसकी
आत्मा। विज्ञानात्मा के ऋत् और सत्य दोनों पक्ष हैं और महत्
उसकी प्रतिष्ठा पुच्छ है। शिर के कट जाने पर आत्मा शरीर को
छोड़ देती है, और शिर के विकार से दोनों हाथ निकम्मे अर्थात्