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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 277 of 415

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Page 277

सौंदर्य लहरी २३७
पक्षाघात के रोगी हो जाते हैं, और प्रतिष्ठा भी नहीं रहती। अर्थात्
श्रद्धा की कमी होते ही उससे योग, सत्य और ऋत् तीनों विदा
होने लगते हैं और महत् का सहारा छूट जाता है। महत् से
आनंदमय सगुण ब्रह्म का ही यहां अभिप्राय है, क्योंकि साधक की
प्रतिष्ठा उसी के आधार पर होती है, न कि लोक प्रतिष्ठा पर।
विज्ञानमय कोष का आधार आनन्दमय आत्मा ही है, उसे स्वयं
परमात्मा का प्रतीक समझना चाहिये।
जब विज्ञानात्मा ही न रहा, तो मनोमय, प्राणमय और अन्नमय
आत्मा की क्या दशा होगी यह पाठकगण स्वयं समझ सकते हैं।
मणिपूर चक्र
(४०)
तडित्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहितप्तं त्रिभुवनम् ॥
शब्दः कमपि=जलको भी, हर=अग्नि ।
अर्थः—तेरे मणिपूर की शरण में गये हुए श्याम मेघों के
रूप धारण करने वाले कं जल की भी सेवा करता हूं, जिन में
अंधकार की परिपंथिनी अर्थात् प्रतिद्वंद्विनी बिजली की चमक
आभरणों में जटित नाना रत्नों की चमक सदृश इन्द्रधनुष का